आपसी समझौते से विवाह समाप्त नहीं हो सकता : हाईकोर्ट
- Advocate Sandeep Pandey
- Mar 17
- 2 min read

भारत में विवाह केवल सामाजिक ही नहीं बल्कि एक कानूनी संस्था भी है, जिसे समाप्त करने के लिए विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच किया गया निजी समझौता अपने-आप विवाह को समाप्त नहीं कर सकता। जब तक वैधानिक रूप से मान्य कोई प्रथा सिद्ध न हो या सक्षम न्यायालय द्वारा तलाक की डिक्री पारित न की जाए, तब तक विवाह कानून की दृष्टि में जारी रहता है।
यह मामला भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से संबंधित एक याचिका के संदर्भ में न्यायालय के समक्ष आया था। पति ने यह तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच अलग रहने का समझौता हो चुका है, इसलिए पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं होना चाहिए। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय परिहार की पीठ ने कहा कि केवल समझौते के आधार पर वैधानिक विवाह समाप्त नहीं माना जा सकता। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह का विघटन केवल न्यायालय की डिक्री या विधि द्वारा मान्य प्रथा के आधार पर ही संभव है।
हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच किया गया समझौता यह साबित करने के लिए साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जा सकता है कि दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे थे। ऐसे मामलों में यह तथ्य भरण-पोषण के दावे के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण हो सकता है।
कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट संदीप पांडे के अनुसार, यह निर्णय पारिवारिक कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि विवाह को समाप्त करने के लिए केवल निजी समझौता पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी को यदि वैधानिक रूप से अलग होना है तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार न्यायालय से विधिवत तलाक की डिक्री प्राप्त करनी होगी।
अधिक जानकारी और कानूनी सलाह के लिए



Comments