दिल्ली जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा दावा गलत तरीके से खारिज करने के लिए स्टार हेल्थ इंश्योरेंस को सेवा में कमी का दोषी ठहराया।
- Advocate Sandeep Pandey
- Mar 16
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दिल्ली के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (ईस्ट दिल्ली) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि बीमा कंपनी बिना ठोस आधार के चिकित्सा बीमा दावा (Insurance Claim) खारिज करती है, तो यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत “सेवा में कमी” (Deficiency in Service) माना जाएगा। आयोग ने इस मामले में स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी को जिम्मेदार ठहराते हुए शिकायतकर्ता को चिकित्सा खर्च और मुआवजा देने का आदेश दिया।
मामले के तथ्य
मामले में शिकायतकर्ता अनुराधा नारंग ने स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के अंतर्गत अस्पताल में हुए इलाज के बाद चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति (reimbursement) के लिए दावा प्रस्तुत किया। बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा अस्वीकार कर दिया कि मरीज को Hiatus Hernia, Duodenitis और Haemorrhoids जैसी बीमारियाँ थीं, जो पॉलिसी की दो वर्ष की एक्सक्लूजन क्लॉज के अंतर्गत आती हैं।
बीमा कंपनी का तर्क था कि अस्पताल द्वारा किए गए कोलोनोस्कोपी और एंडोस्कोपी परीक्षण में इन बीमारियों का संकेत मिला था, इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आयोग की प्रमुख कानूनी टिप्पणियाँ
जिला उपभोक्ता आयोग ने मामले के दस्तावेजों और चिकित्सकीय रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं—
इलाज किस बीमारी का हुआ यह महत्वपूर्ण है
आयोग ने पाया कि मरीज को वास्तव में Acute Gastroenteritis और उससे संबंधित जटिलताओं के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था।
सिर्फ जांच में बीमारी का पता चलना पर्याप्त नहीं
आयोग ने कहा कि जिन बीमारियों को बीमा कंपनी ने एक्सक्लूजन क्लॉज में बताया, उनका इलाज नहीं हुआ था, बल्कि वे केवल जांच के दौरान पता चली थीं। इसलिए उन्हें आधार बनाकर दावा अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
बीमा कंपनी पर प्रमाण का भार
आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि जिस बीमारी के इलाज के लिए खर्च हुआ, वह वास्तव में पॉलिसी की एक्सक्लूजन क्लॉज में आती है।
गलत तरीके से दावा खारिज करना सेवा में कमी
आयोग ने माना कि बिना उचित कारण के बीमा दावा अस्वीकार करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी है।
आयोग का आदेश
आयोग ने शिकायत स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि—
शिकायतकर्ता को ₹1,81,849 चिकित्सा खर्च के रूप में भुगतान किया जाए।
इस राशि पर 9% वार्षिक ब्याज शिकायत दायर करने की तारीख से दिया जाए।
मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए ₹20,000 मुआवजा दिया जाए।
₹12,500 मुकदमा खर्च भी अदा किया जाए।
यदि 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया जाता, तो ब्याज दर 12% प्रति वर्ष लागू होगी।
कानूनी महत्व
यह निर्णय उपभोक्ता अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आयोग ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियाँ तकनीकी या अस्पष्ट कारणों से वैध दावों को अस्वीकार नहीं कर सकतीं और उन्हें पॉलिसी की शर्तों का निष्पक्ष और उचित पालन करना होगा।
केस शीर्षक: Anuradha Narang v. Star Health and Allied Insurance Co. Ltd.
मामला संख्या: CC No. DC/78/CC/25/2024.



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