सर्जरी से पहले जोखिमों की जानकारी दिए बिना लिया गया सहमति पत्र वैध नहीं — महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग
- Advocate Sandeep Pandey
- Jun 5
- 2 min read
लेखक: अधिवक्ता संदीप पाण्डेय
महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल मरीज के हस्ताक्षर वाला पूर्व-मुद्रित (Pre-Printed) सहमति पत्र "Informed Consent" अर्थात् "सूचित सहमति" नहीं माना जा सकता। यदि डॉक्टर या अस्पताल मरीज को सर्जरी की प्रकृति, संभावित जोखिमों, जटिलताओं तथा उपलब्ध वैकल्पिक उपचारों की जानकारी दिए बिना सहमति प्राप्त करते हैं, तो यह सेवा में कमी (Deficiency in Service) मानी जाएगी और इसके लिए चिकित्सक उत्तरदायी होगा।
क्या है मामला?
मामले में आयोग ने पाया कि मरीज से जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराए गए थे, वह केवल एक पूर्व-मुद्रित प्रारूप था। उसमें प्रस्तावित सर्जरी की विशिष्ट जानकारी, उससे जुड़े जोखिम, संभावित जटिलताएं अथवा दृष्टि हानि जैसे गंभीर परिणामों का कोई उल्लेख नहीं था। आयोग ने माना कि ऐसी स्थिति में मरीज द्वारा दी गई सहमति वास्तविक एवं वैध "सूचित सहमति" नहीं कही जा सकती।
सूचित सहमति (Informed Consent) क्या है?
भारतीय विधि के अनुसार किसी भी सर्जिकल प्रक्रिया से पहले मरीज को निम्नलिखित जानकारी दी जानी चाहिए—
उपचार या सर्जरी की प्रकृति।
संभावित जोखिम और जटिलताएं।
उपलब्ध वैकल्पिक उपचार।
उपचार न कराने की स्थिति में संभावित परिणाम।
सफलता एवं विफलता की संभावनाएं।
इन तथ्यों को समझने के बाद मरीज द्वारा दी गई सहमति ही "Informed Consent" कहलाती है।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सर्वोच्च न्यायालय ने Samira Kohli v. Dr. Prabha Manchanda (2008) मामले में कहा था कि मरीज को पर्याप्त जानकारी दिए बिना प्राप्त की गई सहमति वैध नहीं मानी जा सकती। डॉक्टर का दायित्व है कि वह मरीज को प्रक्रिया और उससे जुड़े महत्वपूर्ण जोखिमों के बारे में समझाए ताकि मरीज स्वतंत्र एवं सूचित निर्णय ले सके।
पूर्व-मुद्रित सहमति पत्र पर न्यायालयों की आपत्ति
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) भी पूर्व में यह टिप्पणी कर चुका है कि केवल पूर्व-मुद्रित एवं सामान्य सहमति पत्रों का उपयोग अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) माना जा सकता है, क्योंकि ऐसे फॉर्म किसी भी मरीज और किसी भी प्रक्रिया पर समान रूप से लागू किए जा सकते हैं तथा उनमें व्यक्तिगत जोखिमों का समुचित उल्लेख नहीं होता।
निर्णय का महत्व
यह निर्णय मरीजों के अधिकारों को सशक्त करता है और चिकित्सकों को यह संदेश देता है कि केवल हस्ताक्षर प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। मरीज को उपचार से संबंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों की स्पष्ट जानकारी देना चिकित्सकीय और कानूनी दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है। ऐसा न करने पर डॉक्टर एवं अस्पताल उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
चिकित्सा क्षेत्र में विश्वास और पारदर्शिता सर्वोपरि हैं। सूचित सहमति केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं बल्कि मरीज के स्वायत्त निर्णय के अधिकार की कानूनी सुरक्षा है। इसलिए प्रत्येक डॉक्टर और अस्पताल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीज को उपचार से जुड़े सभी जोखिमों एवं विकल्पों की पूरी जानकारी देकर ही सहमति प्राप्त की जाए।
— अधिवक्ता संदीप पाण्डेय





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