BNSS की धारा 175(3) के आदेश को चुनौती देने की सीमा क्या है?
- Advocate Sandeep Pandey
- Jul 12
- 2 min read
धारा 175(3), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 पूर्व की CrPC की धारा 156(3) का स्थान लेती है। यदि पुलिस संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की FIR दर्ज करने से इंकार करती है, तो पीड़ित मजिस्ट्रेट से पुलिस को FIR दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिलाने का अनुरोध कर सकता है।
BNSS में नए महत्वपूर्ण बदलाव
CrPC की तुलना में BNSS ने कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जोड़े हैं—
पहले एसपी (SP) के पास जाना अनिवार्य
थाना FIR दर्ज न करे तो पहले धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक को शिकायत करनी होगी।
इसके प्रमाण एवं शपथपत्र (Affidavit) के साथ ही धारा 175(3) का आवेदन किया जा सकता है।
मजिस्ट्रेट प्रारंभिक जांच कर सकता है
आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट आवश्यक समझे तो प्रारंभिक जांच कर सकता है।
पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनना आवश्यक
FIR दर्ज कराने का आदेश देने से पहले संबंधित पुलिस अधिकारी को सुनना भी आवश्यक है।
क्या धारा 175(3) के आदेश को चुनौती दी जा सकती है?
हाँ, लेकिन इसकी सीमा बहुत संकीर्ण (Narrow) और समय-निर्भर (Time Sensitive) है।
मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध धारा 438 BNSS के तहत क्रिमिनल रिवीजन (Criminal Revision) दायर की जा सकती है।
सामान्यतः पहले सेशंस कोर्ट में रिवीजन दाखिल करना न्यायिक मर्यादा के अनुरूप माना जाता है।
यदि FIR दर्ज हो चुकी हो तो?
यदि मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद FIR दर्ज हो जाती है, तो केवल रिवीजन से FIR समाप्त नहीं होगी।
ऐसी स्थिति में उचित उपाय है कि उच्च न्यायालय में धारा 528 BNSS के अंतर्गत याचिका दायर कर FIR को चुनौती दी जाए (Quashing Petition)।
मुख्य कानूनी सिद्धांत
धारा 175(3) का उद्देश्य पुलिस की निष्क्रियता पर नियंत्रण रखना है।
मजिस्ट्रेट यांत्रिक तरीके से आदेश नहीं दे सकता; उसे स्वतंत्र रूप से संतुष्ट होना होगा कि पुलिस जांच आवश्यक है।
FIR दर्ज होने के बाद चुनौती का दायरा सीमित हो जाता है, इसलिए शीघ्र कानूनी कार्रवाई महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
धारा 175(3) BNSS पीड़ित को FIR दर्ज कराने का प्रभावी उपाय देती है, लेकिन इसके तहत पारित आदेश को चुनौती देने का अवसर सीमित और समयबद्ध है। FIR दर्ज होने से पहले रिवीजन सबसे प्रभावी उपाय है, जबकि FIR दर्ज होने के बाद सामान्यतः उच्च न्यायालय में धारा 528 BNSS के अंतर्गत याचिका ही उपयुक्त उपाय रहती है।
"उपरोक्त विधिक विश्लेषण एवं व्यक्त विचार अधिवक्ता संदीप पांडे (उच्च न्यायालय) की व्यक्तिगत विधिक राय (Personal Legal Opinion) हैं। प्रत्येक मामले के तथ्य एवं परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं, इसलिए किसी भी कानूनी कार्रवाई से पूर्व संबंधित विधिक सलाह अवश्य प्राप्त करें।"
यह कोई न्यायालय का निर्णय या अंतिम कानूनी सलाह नहीं है।
@lawyer_pandey



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