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SC/ST मामले में अग्रिम जमानत रद्द, पुलिस के बयान पर दर्ज FIR को संदेहास्पद नहीं माना जा सकता.


सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलती है तो FIR किसके बयान पर दर्ज हुई है, यह गौण बात है। केवल इस आधार पर FIR की सत्यता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित की शिकायत के बजाय पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई है।

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपियों को अग्रिम जमानत दी गई थी।

क्या था मामला

यह मामला दो समुदायों के बीच हुए विवाद से जुड़ा है। अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों ने आरोप लगाया था कि उच्च जाति के लोगों के घरों से निकलने वाला नाली का पानी उनके घरों की ओर मोड़ा जा रहा था। जब पीड़ित पक्ष ने इसका विरोध किया तो इलाके में तनाव बढ़ गया।

स्थिति को शांत कराने के लिए पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों में समझौता कराने का प्रयास किया। इसी दौरान विवाद बढ़ गया और आरोप है कि आरोपियों ने हथियारों का इस्तेमाल किया तथा अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों के खिलाफ जातिसूचक गालियां दीं। घटना का वीडियो भी सामने आया बताया गया।

पुलिस अधिकारी के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, भारतीय न्याय संहिता, 2023 तथा आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत FIR दर्ज की।

हाईकोर्ट ने क्यों दी थी जमानत

आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत दे दी कि FIR सीधे पीड़ित की शिकायत पर दर्ज नहीं हुई थी, बल्कि पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई थी। अदालत ने इस आधार पर FIR की प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त किया था।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने FIR के स्रोत को अनावश्यक रूप से अधिक महत्व दिया और यह नहीं देखा कि क्या उसमें संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है।

अदालत ने कहा:

“एक बार जब सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो यह मायने नहीं रखता कि FIR किसके बयान पर दर्ज हुई है। विशेष रूप से तब जब पुलिस अधिकारी स्वयं घटना का प्रत्यक्षदर्शी हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट और पुलिस द्वारा दायर हलफनामे जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की, जिनमें गोली चलाने और जातिसूचक गालियां देने के आरोप स्पष्ट रूप से दर्ज थे।

आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत समाप्त कर दी और उन्हें 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण (surrender) करने का निर्देश दिया।

मामला: Kuldeep Singh & Anr. vs State of Punjab & Anr.


 
 
 

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