POCSO मामलों में पीड़ित के माता-पिता को नोटिस की प्रक्रिया का पालन जरूरी, हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस और लोक अभियोजकों को दिए स्पष्ट निर्देश
बच्चों के यौन अपराधों से संबंधित मामलों में कानून का उद्देश्य केवल आरोपी को दंडित करना नहीं, बल्कि पीड़ित बच्चे और उसके परिवार के अधिकारों की भी प्रभावी सुरक्षा करना है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस, Public Prosecutors तथा संबंधित अधिकारियों को POCSO मामलों में जमानत आवेदन की सूचना पीड़ित के माता-पिता/अभिभावक तक सही तरीके से पहुंचाने के निर्देश दिए हैं।
हाल ही में Sonu Gurjar v. State of Rajasthan, S.B. Criminal Misc. Bail Application No. 12222/2026 में न्यायमूर्ति संदीप शाह की एकल पीठ के समक्ष ऐसा मामला आया, जिसमें पीड़ित के माता-पिता को जमानत आवेदन की जानकारी देने का दावा तो किया गया, लेकिन नोटिस पर केवल हस्ताक्षर था। नोटिस प्राप्त करने वाले व्यक्ति का नाम अथवा पूरा विवरण तथा नोटिस प्राप्त करने की तारीख और समय दर्ज नहीं था।
केवल हस्ताक्षर करवा लेना पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को गंभीरता से लेते हुए कहा कि POCSO मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का वास्तविक और प्रभावी पालन होना चाहिए।
अदालत ने विशेष रूप से Sandeep Singh @ Sonu v. State of Rajasthan (2025) में दिए गए निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा। उस निर्णय में यह स्पष्ट किया गया था कि जमानत आवेदन दाखिल होने की जानकारी पीड़ित बच्चे के माता-पिता/अभिभावक तक पहुंचाई जानी चाहिए।
इसका अर्थ है कि पुलिस रिकॉर्ड में यह स्पष्ट होना चाहिए कि—
सूचना किस व्यक्ति को दी गई;
उस व्यक्ति की पहचान/विवरण क्या है;
सूचना कब दी गई;
नोटिस प्राप्त करने की तारीख और समय क्या है;
तथा आवश्यक होने पर पीड़ित पक्ष को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी अपनाई गई।
पीड़ित का अधिकार भी, आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी
इस मामले का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू है।
POCSO मामले में पीड़ित पक्ष को जमानत कार्यवाही की जानकारी और प्रभावी सुनवाई का अवसर मिलना आवश्यक है। दूसरी ओर, आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि यदि नोटिस की सेवा ठीक से नहीं होती और प्रत्येक तारीख पर फिर से नोटिस जारी करने की आवश्यकता पड़ती है, तो जमानत आवेदन के निर्णय में अनावश्यक देरी होती है और आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
पीड़ित को सुनवाई का अधिकार, लेकिन हर मामले में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है।
राजस्थान हाईकोर्ट की Division Bench ने Pooja Gurjar v. State of Rajasthan (19 December 2023) में स्पष्ट किया था कि पीड़ित को आपराधिक कार्यवाही में participatory rights प्राप्त हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक जमानत आवेदन में पीड़ित को अनिवार्य रूप से respondent/party बनाया जाए।
बाद में Sandeep Singh @ Sonu (2025) मामले में भी इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाया गया—पीड़ित या उसके अभिभावक को कार्यवाही की जानकारी देना आवश्यक है, लेकिन उन्हें हर स्थिति में औपचारिक पक्षकार बनाना अलग प्रश्न है।
Legal Aid की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने यह भी गंभीरता से देखा कि कई मामलों में पीड़ित की ओर से कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं होता। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पुलिस द्वारा आवश्यक paper book की प्रति DSLA/RLSA को उपलब्ध नहीं कराई जा रही, जिससे पीड़ित परिवार को कानूनी सहायता प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
इसलिए यह आदेश केवल “नोटिस सर्व करने” का आदेश नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि POCSO पीड़ित को उसके कानूनी अधिकारों की वास्तविक जानकारी और आवश्यक कानूनी सहायता मिले।
निष्कर्ष
POCSO मामलों में न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं है। न्याय का अर्थ है—पीड़ित बच्चे की सुरक्षा, परिवार को जानकारी, प्रभावी कानूनी सहायता और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश पुलिस और अभियोजन एजेंसियों के लिए स्पष्ट संदेश है कि न्यायालय के निर्देशों की केवल औपचारिक खानापूर्ति पर्याप्त नहीं होगी। नोटिस की service ऐसी होनी चाहिए जिससे न्यायालय के सामने उसका स्पष्ट और विश्वसनीय रिकॉर्ड उपलब्ध हो।
साथ ही, यह आदेश इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को मजबूत करता है कि Victim's participation और accused's personal liberty—दोनों को कानून के दायरे में समान गंभीरता से सुरक्षित करना न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
— Advocate Sandeep Pandey



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