बिना प्रक्रिया गिरफ्तारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्ती. महाराष्ट्र के सभी पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस आयुक्तों (CP) को निर्देश देने का आदेश।

BNSS की धारा 35 पुलिस को गिरफ्तारी की शक्ति देती है, लेकिन मनमानी गिरफ्तारी की अनुमति नहीं
Advocate Sandeep Pandey
Legal Consultant & Practitioner
हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि कानून में गिरफ्तारी की शक्ति होना और हर स्थिति में गिरफ्तारी करना—दो अलग बातें हैं। 10 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव की एकल पीठ ने Omkar Balkrushna Gade & Anr. v. State of Maharashtra मामले में दो भाइयों की गिरफ्तारी को अवैध माना और महाराष्ट्र के सभी पुलिस अधिकारियों को BNSS की धारा 35 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के निर्देश दिए।
मामला क्या था?
मामला पुणे के Talegaon Dabhade Police Station में दर्ज अपराध से संबंधित था। दोनों भाइयों को BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिया गया था। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया कि नोटिस देने और गिरफ्तारी की कार्रवाई लगभग उसी समय की गई। हाईकोर्ट ने माना कि इस प्रकार नोटिस की वैधानिक प्रक्रिया का उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाता है।
दोनों आरोपियों को ₹5,000-₹5,000 के व्यक्तिगत बंधपत्र पर जमानत दी गई। साथ ही हाईकोर्ट के Registrar General को आदेश की प्रति महाराष्ट्र के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों तथा सभी Police Commissioners को भेजने का निर्देश दिया गया, ताकि पुलिस अधिकारियों को धारा 35 की प्रक्रिया का पालन करने के लिए कहा जा सके।
BNSS की धारा 35 का महत्व
BNSS Section 35(3) के अंतर्गत, जब ऐसी स्थिति हो जिसमें तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, पुलिस अधिकारी व्यक्ति को नोटिस देकर जांच में उपस्थित होने के लिए कह सकता है।
वहीं, सात वर्ष तक की सजा वाले संज्ञेय अपराधों के संबंध में धारा 35 में गिरफ्तारी को कुछ निर्धारित परिस्थितियों से जोड़ा गया है—जैसे आगे अपराध रोकना, उचित जांच के लिए गिरफ्तारी आवश्यक होना, साक्ष्य से छेड़छाड़ रोकना, गवाहों को प्रभावित करने से रोकना या न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना। गिरफ्तारी आवश्यक न होने पर उसके कारणों को रिकॉर्ड करने का प्रावधान भी है।
इसलिए सिर्फ FIR दर्ज होना अपने-आप में हर मामले में गिरफ्तारी का आधार नहीं बन जाता।
सुप्रीम कोर्ट की पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण कसौटी
यह सिद्धांत नया नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने Satender Kumar Antil v. CBI में गिरफ्तारी की आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर विस्तृत दिशा-निर्देश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की वैधानिक शक्ति का अस्तित्व अपने-आप में गिरफ्तारी को अनिवार्य नहीं बनाता।
बाद के निर्णयों में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है और उसके फरार होने या समन की अवहेलना करने की आशंका नहीं है, तो केवल आरोप-पत्र दाखिल होने के कारण उसे गिरफ्तार करना आवश्यक नहीं माना जा सकता।
आम नागरिक के लिए इसका क्या अर्थ है?
इस आदेश से एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश सामने आता है—
नोटिस जांच में सहयोग का अवसर है, गिरफ्तारी का औपचारिक विकल्प मात्र नहीं।
यदि किसी व्यक्ति को BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस प्राप्त होता है, तो उसे नोटिस को गंभीरता से लेना चाहिए और निर्धारित समय तथा स्थान पर जांच में सहयोग करना चाहिए। दूसरी ओर, पुलिस को भी नोटिस और गिरफ्तारी से संबंधित वैधानिक शर्तों का पालन करना आवश्यक है।
हालांकि प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं। गंभीर अपराध, जांच की आवश्यकता, साक्ष्य से छेड़छाड़ की आशंका, फरार होने की संभावना या अन्य वैधानिक परिस्थितियों में गिरफ्तारी के प्रश्न का निर्णय अलग तरीके से हो सकता है।
निष्कर्ष
कानून का उद्देश्य केवल अपराध की जांच करना नहीं, बल्कि जांच की प्रक्रिया को कानून के दायरे में रखना भी है।
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश इसी महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने वाली पुलिस कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए। यह आदेश पुलिस के अधिकार को समाप्त नहीं करता, बल्कि उस अधिकार के प्रयोग के लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के महत्व को सामने रखता है।
Advocate Sandeep Pandey
Legal Consultant & Practitioner
यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से है; किसी विशेष मामले में कार्रवाई से पहले संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर विधिक सलाह लेना उचित है।



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