अयोध्या फैसले को चुनौती देने वाले अधिवक्ता महमूद प्राचा पर ₹6 लाख की अदायगी न होने पर संपत्ति कुर्की वारंट: अदालत के आदेश का कानूनी संदेश
- Advocate Sandeep Pandey
- 5 days ago
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लेखक: अधिवक्ता संदीप पांडेय
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने अधिवक्ता महमूद प्राचा के विरुद्ध उनकी चल संपत्ति की कुर्की के वारंट जारी करने का आदेश दिया है। मामला ₹6 लाख की उस डिक्री राशि की वसूली से जुड़ा है, जो अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2019 के फैसले को “शून्य और निरस्त” घोषित करने की मांग वाली उनकी याचिका से संबंधित मुकदमे में लागत के रूप में निर्धारित की गई थी।
मामला क्या है?
महमूद प्राचा ने एक दीवानी मुकदमे के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2019 के अयोध्या फैसले को चुनौती देने का प्रयास किया था। ट्रायल कोर्ट ने अप्रैल 2025 में उनकी याचिका खारिज करते हुए ₹1 लाख की लागत लगाई।
इसके बाद उन्होंने इस निर्णय को जिला अदालत में चुनौती दी। जिला जज धर्मेंद्र राणा ने 18 अक्टूबर को चुनौती खारिज करते हुए अतिरिक्त ₹5 लाख की लागत लगा दी। इस प्रकार कुल लागत ₹6 लाख हो गई। अदालत ने टिप्पणी की थी कि मुकदमेबाजी को रोकने के लिए लागत का प्रभाव पर्याप्त निरोधात्मक होना चाहिए और अदालतों के समय तथा संसाधनों के दुरुपयोग को नियंत्रित करना आवश्यक है।
अब संपत्ति कुर्की क्यों?
₹6 लाख की राशि की वसूली के लिए New Delhi District Legal Services Authority (NDLSA) ने execution proceedings शुरू कीं। पटियाला हाउस कोर्ट की जज मेधा आर्या ने 14 अगस्त 2026 के आदेश में कहा कि judgment debtor को आपत्तियां दाखिल करने के लिए कई अवसर दिए गए, लेकिन आपत्तियां दाखिल नहीं की गईं।
इसके बाद अदालत ने आदेश दिया कि डिक्री राशि के बराबर चल संपत्ति की कुर्की के वारंट जारी किए जाएं। आदेश के अनुसार, जरूरत पड़ने पर Bailiff को ताले खोलकर कुर्की की कार्रवाई करने की अनुमति भी दी गई है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है—यह गिरफ्तारी का वारंट नहीं, बल्कि डिक्री की धनराशि की वसूली के लिए संपत्ति की कुर्की से संबंधित आदेश है।
कानूनी रूप से इसका महत्व क्या है?
किसी मुकदमे में अदालत द्वारा लागत या धनराशि निर्धारित किए जाने के बाद यदि वह राशि स्वेच्छा से अदा नहीं होती, तो decree-holder को execution proceedings के माध्यम से उसकी वसूली का अधिकार होता है।
अर्थात् मुकदमा समाप्त होना हमेशा कानूनी प्रक्रिया का अंतिम चरण नहीं होता। यदि अदालत का आर्थिक आदेश लागू नहीं किया जाता, तो उसके enforcement के लिए execution proceedings शुरू की जा सकती हैं।
इस मामले में भी मूल विवाद से अलग अब अदालत के सामने मुख्य प्रश्न ₹6 लाख की डिक्री की execution का है।
अयोध्या फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत की टिप्पणी
जिला अदालत ने प्राचा की याचिका को गंभीरता से लेते हुए कई कानूनी आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने माना कि प्राचा मूल अयोध्या मुकदमे के पक्षकार नहीं थे और इसलिए उन्हें उस निर्णय को इस तरीके से चुनौती देने के अधिकार पर प्रश्न उठता है।
याचिका का आधार पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ के 2024 के पुणे में दिए गए कथित सार्वजनिक वक्तव्य से जुड़ा था। प्राचा का तर्क था कि उस कथन के आधार पर 2019 के फैसले की वैधता पर सवाल उठता है।
जिला अदालत ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया और पूर्व CJI की ईश्वर से मार्गदर्शन प्राप्त करने संबंधी कथित टिप्पणी को न्यायिक निर्णय में धोखाधड़ी का प्रमाण मानने से इनकार किया।
“Frivolous Litigation” पर अदालत की सख्ती
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण व्यापक संदेश frivolous या निरर्थक मुकदमेबाजी के विरुद्ध अदालतों की बढ़ती सख्ती है।
भारतीय न्याय व्यवस्था पहले ही लंबित मामलों के भारी बोझ से जूझ रही है। ऐसे में यदि कोई मुकदमा कानून में ठोस आधार के बिना केवल किसी सार्वजनिक व्यक्ति, न्यायाधीश या पहले से निर्णीत विवाद को बार-बार चुनौती देने के उद्देश्य से लाया जाता है, तो अदालतें लागत लगाकर ऐसी प्रवृत्ति को हतोत्साहित कर सकती हैं।
जिला अदालत ने कथित तौर पर यह भी कहा था कि न्यायपालिका और Bar की जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक जीवन में लंबी सेवा देने वाले व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति के बाद अनावश्यक मुकदमों का सामना न करना पड़े।
क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक है?
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
किसी न्यायिक फैसले की आलोचना करना, उसकी संवैधानिकता पर बहस करना या उसके विरुद्ध उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। लेकिन कानूनी अधिकार का प्रयोग और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग—दो अलग बातें हैं।
अदालतों का अधिकार है कि वे किसी मुकदमे को कानूनन अस्थिर, निराधार या प्रक्रिया का दुरुपयोग मानने पर उचित लागत लगा सकती हैं। इस मामले में अदालत की कार्रवाई का तत्काल उद्देश्य किसी विचार को दबाना नहीं, बल्कि पहले से निर्धारित ₹6 लाख की आर्थिक देनदारी को execute करना है।
2019 का अयोध्या फैसला
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अयोध्या विवाद पर सर्वसम्मत फैसला सुनाया था। अदालत ने विवादित भूमि रामलला विराजमान के पक्ष में मंदिर निर्माण के लिए देने और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का निर्देश दिया था।
मौजूदा execution proceeding उस ऐतिहासिक फैसले का पुनः परीक्षण नहीं कर रही है। इसका विषय केवल उस मुकदमे में निर्धारित ₹6 लाख की लागत की वसूली है।
निष्कर्ष
महमूद प्राचा की चल संपत्ति की कुर्की का आदेश भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है—अदालत के आदेश केवल कागज पर नहीं होते; उनके पालन और enforcement की भी पूरी कानूनी व्यवस्था है।
किसी भी नागरिक, वकील या सार्वजनिक व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखने का अधिकार है। लेकिन उसी के साथ अदालत की प्रक्रिया का सम्मान करना और अदालत द्वारा निर्धारित आर्थिक दायित्वों का पालन करना भी आवश्यक है।
इस मामले में आगे की कार्यवाही यह स्पष्ट करेगी कि ₹6 लाख की डिक्री की execution किस प्रकार पूरी होती है। मामला 27 अगस्त 2026 को Additional Chief Judicial Magistrate, Patiala House Courts के समक्ष और 1 अक्टूबर 2026 को जज मेधा आर्या के समक्ष सूचीबद्ध है।
— अधिवक्ता संदीप पांडेय
Legal Consultant & Practitioner



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