भारत से केवल विद्यार्थी नहीं, पैसा और प्रतिभा भी विदेश जा रही है!
- Advocate Sandeep Pandey
- Aug 10
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क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था देश का धन, प्रतिभा और भविष्य विदेश भेज रही है?
लेखक: Advocate Sandeep Pandey
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हमारे पास विशाल युवा आबादी है, प्रतिभा की कमी नहीं है और दुनिया की बड़ी कंपनियों में भारतीय professionals अपनी क्षमता का लोहा मनवा रहे हैं।
फिर भी एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने है—
जब भारत के पास इतनी बड़ी युवा प्रतिभा है, तो हमारे हजारों-लाखों विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने को क्यों मजबूर या आकर्षित हो रहे हैं?
विदेश जाकर पढ़ना अपने आप में गलत नहीं है। दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में पढ़ना, नई तकनीक सीखना और अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना भारत के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
लेकिन समस्या तब है जब विदेश जाना भारत की शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी का विकल्प बन जाए और इसके साथ भारतीय परिवारों की भारी पूंजी तथा देश की प्रतिभा भी विदेश चली जाए।
यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं है।
यह विदेशी मुद्रा, रोजगार, मानव पूंजी, सामाजिक नीति और भारत के भविष्य का प्रश्न है।
US$3.48 Billion का सवाल
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में Liberalised Remittance Scheme यानी LRS के अंतर्गत भारतीय निवासियों द्वारा “Studies Abroad” के लिए लगभग US$3.48 billion की outward remittance की गई।
यह रकम लगभग 3.48 अरब अमेरिकी डॉलर है।
यह आंकड़ा केवल विदेश में शिक्षा के लिए LRS के अंतर्गत दर्ज remittance को दर्शाता है। इसमें विदेश शिक्षा से जुड़े प्रत्येक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खर्च को जोड़कर कोई संपूर्ण “education outflow” आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
फिर भी यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रश्न जरूर खड़ा करता है—
यदि इतनी बड़ी विदेशी मुद्रा विदेश में शिक्षा पर खर्च हो रही है, तो भारत में उसी स्तर की गुणवत्तापूर्ण और affordable शिक्षा व्यवस्था विकसित करने में कितना निवेश किया जाना चाहिए?
विदेशी शिक्षा पर खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया नुकसान नहीं है। विद्यार्थी विदेश से ज्ञान लेकर भारत लौट सकता है, विदेश में कमाकर भारत में remittance भेज सकता है और अंतरराष्ट्रीय अनुभव भारत के विकास में लगा सकता है।
लेकिन यदि भारत अपने विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय शिक्षा देश में ही उपलब्ध करा दे, तो वही पूंजी भारतीय विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, laboratories, teachers, researchers और भारतीय अर्थव्यवस्था में अधिक समय तक घूम सकती है।
क्या भारत शिक्षा के साथ पैसा भी निर्यात कर रहा है?
आज विदेश शिक्षा का एक पूरा ecosystem बन चुका है।
Admission consultancy, application processing, visa assistance, test preparation, documentation, foreign accommodation और अन्य सेवाओं का बड़ा बाजार विकसित हो चुका है।
इससे भारत में भी रोजगार पैदा होते हैं, इसलिए इस पूरे क्षेत्र को नकारात्मक रूप से देखना उचित नहीं है।
लेकिन राष्ट्रीय नीति का सवाल अलग है—
क्या भारत को ऐसा शिक्षा मॉडल बनाना चाहिए जिसमें विद्यार्थी के पास विदेश जाना विकल्प हो, मजबूरी नहीं?
यदि एक भारतीय परिवार अपने बच्चे को विदेश भेजने के लिए लाखों रुपये खर्च करता है, education loan लेता है और अपनी वर्षों की बचत लगाता है, तो हमें केवल परिवार को दोष नहीं देना चाहिए।
हमें यह पूछना चाहिए—
भारत में उसे विश्वस्तरीय विकल्प क्यों नहीं मिला?
शिक्षा केवल डिग्री बांटने की मशीन नहीं हो सकती
हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है कि डिग्री और शिक्षा को अक्सर एक ही मान लिया जाता है।
लेकिन वास्तविक शिक्षा वह है जो विद्यार्थी को—
प्रश्न पूछना,
समस्या का समाधान करना,
वैज्ञानिक सोच विकसित करना,
नया उत्पाद बनाना,
research करना,
business शुरू करना,
risk लेना,
और दूसरों के लिए रोजगार पैदा करना
सिखाए।
यदि चार-पांच साल की शिक्षा के बाद विद्यार्थी की सबसे बड़ी आकांक्षा केवल यह रह जाए कि—
“सरकार मुझे नौकरी दे”
तो हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य पर पुनर्विचार करना होगा।
सरकारी नौकरी सम्मानजनक career है, लेकिन हर शिक्षित युवा का अंतिम लक्ष्य सरकारी नौकरी होना किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
भारत को करोड़ों नौकरी खोजने वालों के साथ-साथ करोड़ों job creators, entrepreneurs, scientists और innovators की आवश्यकता है।
जातिगत आरक्षण पर भी होनी चाहिए गंभीर राष्ट्रीय बहस
भारत में जातिगत आरक्षण एक ऐतिहासिक और संवैधानिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को अवसर उपलब्ध कराना रहा है।
इस व्यवस्था पर चर्चा करते समय एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए—
आरक्षण पाने वाला प्रत्येक व्यक्ति नौकरी मांगने वाली मानसिकता रखता है—ऐसा कहना न तो उचित है और न तथ्यात्मक।
आरक्षण के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले हजारों-लाखों लोग डॉक्टर, engineer, administrator, entrepreneur, professor, scientist और professionals बने हैं।
लेकिन इसके बावजूद आरक्षण की वर्तमान संरचना और उसके दीर्घकालीन परिणामों पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा होना चाहिए।
सवाल यह होना चाहिए कि क्या आरक्षण का अंतिम लक्ष्य केवल—
शिक्षा → डिग्री → नौकरी
होना चाहिए?
या इसे आगे बढ़ाकर—
शिक्षा → कौशल → उद्यमिता → innovation → रोजगार सृजन
बनाना चाहिए?
यही वह बिंदु है जहां भारत को अपनी सामाजिक नीतियों पर एक नई सोच विकसित करनी होगी।
आरक्षण का लक्ष्य अवसर हो, स्थायी निर्भरता नहीं
किसी भी सामाजिक नीति की सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने व्यक्ति को कितनी स्वतंत्र क्षमता दी।
यदि कोई विद्यार्थी आरक्षण या सरकारी सहायता के माध्यम से उच्च शिक्षा प्राप्त करता है और बाद में scientist, doctor, entrepreneur या industrialist बनकर सैकड़ों लोगों को रोजगार देता है, तो वह नीति की बड़ी सफलता है।
लेकिन यदि शिक्षा व्यवस्था किसी भी वर्ग के युवाओं को केवल सरकारी नौकरी प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा तक सीमित कर देती है, तो उसकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है।
इसलिए आरक्षण और सामाजिक कल्याण की नीतियों को entrepreneurship और innovation से जोड़ने की आवश्यकता है।
आरक्षित वर्गों के विद्यार्थियों के लिए विशेष—
startup funding,
incubation centres,
entrepreneurship training,
technology labs,
patent support,
business mentorship,
venture funding और
market access
जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं।
लक्ष्य होना चाहिए—सिर्फ “सरकारी नौकरी पाने वाला” नहीं, बल्कि “रोजगार देने वाला” नागरिक।
भारत को “Reservation Beneficiary” से आगे “Opportunity Creator” बनाना होगा
यह सोच केवल आरक्षित वर्गों के लिए नहीं होनी चाहिए।
यह हर भारतीय युवा के लिए होनी चाहिए।
सामान्य वर्ग हो, OBC हो, SC हो, ST हो या किसी अन्य सामाजिक समूह से आने वाला विद्यार्थी—भारत को हर युवा को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो उसे आत्मनिर्भर बनाए।
किसी युवा की सफलता का अंतिम प्रमाण केवल सरकारी नियुक्ति नहीं होना चाहिए।
एक युवा यदि 20 लोगों को रोजगार देता है, तो वह भी राष्ट्र निर्माण कर रहा है।
यदि कोई scientist नई technology विकसित करता है, तो वह राष्ट्र निर्माण कर रहा है।
यदि कोई doctor ग्रामीण क्षेत्र में healthcare startup बनाता है, तो वह राष्ट्र निर्माण कर रहा है।
यदि कोई entrepreneur हजारों लोगों के लिए रोजगार पैदा करता है, तो वह राष्ट्र निर्माण कर रहा है।
यही मानसिकता भारत की अगली आर्थिक छलांग का आधार बन सकती है।
मुफ्त और affordable शिक्षा क्यों जरूरी है?
यहां “मुफ्त शिक्षा” का अर्थ हर व्यक्ति को हर स्तर पर बिना लागत के शिक्षा देना नहीं है।
सरकार का लक्ष्य होना चाहिए—
गुणवत्तापूर्ण, affordable और merit-supporting public education।
विशेष रूप से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा आर्थिक बाधा नहीं बननी चाहिए।
क्योंकि यदि एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी पैसे के अभाव में doctor, scientist, engineer या entrepreneur नहीं बन पाता, तो नुकसान केवल उसके परिवार का नहीं है।
देश एक संभावित वैज्ञानिक खोता है।
देश एक संभावित entrepreneur खोता है।
देश एक संभावित innovator खोता है।
इसलिए शिक्षा पर सरकारी खर्च को केवल subsidy नहीं, बल्कि human capital investment समझना चाहिए।
MBBS: डॉक्टर की सीट नहीं, राष्ट्रीय निवेश
मेडिकल शिक्षा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
यदि भारत में पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण और affordable medical seats उपलब्ध नहीं होंगी, तो विद्यार्थी विदेश जाएंगे।
इसके बाद परिवार को tuition fees, accommodation, travel और अन्य खर्च उठाने पड़ेंगे।
भारत को मेडिकल शिक्षा के लिए केवल कॉलेजों की संख्या नहीं बढ़ानी चाहिए, बल्कि—
medical colleges + teaching hospitals + laboratories + clinical training + research + affordable fees
का मजबूत ecosystem तैयार करना चाहिए।
भारत के प्रत्येक प्रतिभाशाली विद्यार्थी को यह महसूस होना चाहिए कि डॉक्टर बनने के लिए विदेश जाना ही एकमात्र रास्ता नहीं है।
MBA: नौकरी नहीं, business creation का माध्यम
MBA की शिक्षा भी केवल corporate नौकरी हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
भारत को ऐसे management graduates चाहिए जो—
startups शुरू करें,
manufacturing units स्थापित करें,
exports बढ़ाएं,
technology को business से जोड़ें,
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को modernize करें,
Indian brands को global बनाएं।
भारत को MBA graduates की संख्या से ज्यादा successful business creators की संख्या पर ध्यान देना होगा।
Brain Drain को Brain Gain में बदलना होगा
विदेश में पढ़ने वाले हर विद्यार्थी को “देश छोड़ने वाला” कहना भी गलत है।
आज भारतीय वैज्ञानिक, engineers, doctors और entrepreneurs दुनिया के अलग-अलग देशों में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं।
भारत को उन्हें रोकने के बजाय उनसे जुड़ने की नीति बनानी चाहिए।
यदि विदेश गया भारतीय scientist भारत में research collaboration शुरू करता है, भारतीय startup में निवेश करता है या वापस आकर laboratory स्थापित करता है, तो उसका विदेश जाना भी भारत के लिए लाभकारी बन सकता है।
हमें Brain Drain से Brain Circulation और Brain Gain की ओर जाना होगा।
शिक्षा की सफलता का पैमाना बदलना होगा
आज हम पूछते हैं—
कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा पास की?
हमें पूछना चाहिए—
कितने विद्यार्थियों ने कुछ नया बनाया?
आज हम पूछते हैं—
कितने विद्यार्थियों को नौकरी मिली?
हमें पूछना चाहिए—
कितने विद्यार्थियों ने रोजगार पैदा किया?
आज हम पूछते हैं—
कितने विद्यार्थियों को डिग्री मिली?
हमें पूछना चाहिए—
कितने विद्यार्थी scientist, entrepreneur, inventor और problem solver बने?
यही शिक्षा नीति का वास्तविक परिवर्तन होगा।
भारत को दुनिया का Education Destination बनना चाहिए
भारत के पास प्राचीन ज्ञान परंपरा है।
आज हमारे पास IIT, IIM, AIIMS, IISc और अनेक उत्कृष्ट संस्थान भी हैं।
लेकिन भारत का लक्ष्य केवल अपने बच्चों को विदेश भेजना नहीं होना चाहिए।
भारत को एक दिन ऐसा देश बनना चाहिए जहां—
अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, एशिया और दुनिया के अन्य देशों के विद्यार्थी भी उच्च शिक्षा लेने आएं।
तब विदेशी मुद्रा भारत में आएगी।
भारतीय विश्वविद्यालयों का वैश्विक प्रभाव बढ़ेगा।
Research ecosystem मजबूत होगा।
और भारत education exporter बन सकेगा।
विकसित भारत का असली अर्थ
विकसित राष्ट्र केवल सड़कों, पुलों, airports और buildings से नहीं बनता।
विकसित राष्ट्र बनता है—
विश्वविद्यालयों से।
Laboratories से।
Scientists से।
Doctors से।
Entrepreneurs से।
Innovators से।
Skilled और self-confident युवाओं से।
इसलिए भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जो युवा से यह न कहे—
“तुम नौकरी खोजो।”
बल्कि यह सिखाए—
“तुम समस्या खोजो, समाधान बनाओ और रोजगार पैदा करो।”
निष्कर्ष: भारत को डिग्री नहीं, भविष्य बनाना है
विदेश में पढ़ने वाले भारतीय विद्यार्थियों को दोष देना समाधान नहीं है।
आरक्षण पाने वाले विद्यार्थियों को दोष देना भी समाधान नहीं है।
सरकारी नौकरी चाहने वाले युवाओं को दोष देना भी समाधान नहीं है।
समाधान शिक्षा और अवसर की पूरी संरचना बदलने में है।
भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जो गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चे को भी विश्वस्तरीय शिक्षा दे।
ऐसी सामाजिक नीति चाहिए जो वंचित वर्गों को अवसर दे और उन्हें दीर्घकाल में आत्मनिर्भर, उद्यमी और innovation-driven बनाए।
ऐसी university चाहिए जो केवल degree नहीं, invention पैदा करे।
और ऐसी आर्थिक नीति चाहिए जो educated youth को job seeker से job creator बनने का अवसर दे।
RBI के अनुसार केवल LRS के तहत विदेश में studies के लिए वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग US$3.48 billion की remittance हुई। यह आंकड़ा हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए है।
सवाल यह नहीं कि हमारे बच्चे विदेश क्यों जा रहे हैं।
सवाल यह है कि भारत उन्हें विश्वस्तरीय शिक्षा अपने देश में क्यों नहीं दे पा रहा?
सवाल यह नहीं कि युवा सरकारी नौकरी क्यों मांगता है।
सवाल यह है कि हमने उसे entrepreneur बनने के लिए कितना अवसर दिया?
सवाल यह नहीं कि आरक्षण किसे मिला।
सवाल यह है कि शिक्षा और अवसर मिलने के बाद हम हर युवा को आत्मनिर्भर, innovator और रोजगार सृजक कैसे बनाएंगे?
भारत को नौकरी मांगने वाले युवाओं का देश नहीं, रोजगार पैदा करने वाले युवाओं का देश बनना होगा।
भारत को शिक्षा और प्रतिभा का exporter नहीं, बल्कि global knowledge और education का destination बनना होगा।
और शायद यही वह बदलाव होगा जो भारत को केवल आर्थिक रूप से बड़ा नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, नवाचार और मानव क्षमता के मामले में विश्व का नेतृत्व करने वाला राष्ट्र बनाएगा।
Advocate Sandeep Pandey
Legal Consultant & Practitioner
Nagpur District Court & High Court



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