आरोपी और दोषसिद्ध में मौलिक अंतर
- Advocate Sandeep Pandey
- Feb 15
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यह संदर्भ आरोपियों के सार्वजनिक प्रदर्शन से जुड़ा है, जैसा कि के हालिया आदेश , एस.बी. क्रिमिनल रिट याचिका संख्या 224/2026, दिनांक 20.01.2026 में प्रतिपादित किया गया। यह आदेश न्यायालय के बाहर भी “निर्दोषिता की प्रत्याशा” (Presumption of Innocence) की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
आरोपी और दोषसिद्ध में मौलिक अंतर
आरोपी और दोषसिद्ध व्यक्ति समान स्थिति में नहीं होते। यह अंतर आपराधिक न्यायशास्त्र के मूल में निहित है और परीक्षण (ट्रायल) की आवश्यकता का आधार है। दोष अनुमान से नहीं, बल्कि सक्षम न्यायालय के समक्ष साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध किया जाता है। जब तक यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती, तब तक व्यक्ति विधिक रूप से निर्दोष माना जाता है और यदि बरी हो जाए तो बिना कलंक समाज में लौटने का अधिकार रखता है।
न्यायालयों ने बार-बार इस सिद्धांत को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ा है। “निर्दोषिता की प्रत्याशा” का अर्थ है कि राज्य को दंड देने से पूर्व दोष सिद्ध करना अनिवार्य है।
व्यवहार में विचलन
स्पष्ट संवैधानिक निर्देशों के बावजूद, व्यवहार में अक्सर आरोपियों को पुलिस थानों में फर्श पर बैठाकर या प्रेस वार्ताओं में अधिकारियों के पीछे खड़ा कर “प्रदर्शित” किया जाता है। कई मामलों में उन्हें सार्वजनिक सड़कों पर परेड कराया जाता है, जूतों की माला पहनाई जाती है या अन्य प्रकार से अपमानित किया जाता है—जबकि उनकी दोषसिद्धि न्यायालय द्वारा अभी निर्धारित नहीं हुई होती।
ऐसी कार्रवाइयाँ आरोप और दोषसिद्धि के बीच की रेखा को धुंधला कर देती हैं और मुकदमे से पहले ही दंड का रूप ले लेती हैं।
इस्लाम खान प्रकरण: संस्थागत अपमान का न्यायिक प्रतिरोध
में ने पाया कि आरोपियों को पुलिस स्टेशन में प्रेस के समक्ष फर्श पर बैठने के लिए विवश किया गया, कुछ मामलों में आंशिक रूप से वस्त्रहीन अवस्था में, और उनके फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपी दोषसिद्ध नहीं है और गिरफ्तारी के साथ संवैधानिक संरक्षण समाप्त नहीं होते। न्यायालय ने इस प्रथा को “संस्थागत अपमान” (Institutional Humiliation) बताते हुए कहा कि यह अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही, न्यायालय ने 24 घंटे के भीतर ऐसे सभी फोटो और वीडियो हटाने का निर्देश दिया।
विधिक आधार का अभाव
ऐसी कार्रवाइयों का कोई स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं है—न पुलिस अधिनियम में, न पुलिस मैनुअल में, न पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता में, और न ही नवीन अधिनियमित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में।
गिरफ्तारी का उद्देश्य जांच की निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की सुरक्षा है, न कि सार्वजनिक तमाशा बनाना।
गृह मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2010 की परामर्श द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि आरोपियों को मीडिया के सामने परेड न कराया जाए और उनके विधिक व मानवीय अधिकारों का उल्लंघन न हो। इसी प्रकार, ने भी दिशानिर्देश जारी कर सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक और गरिमा की रक्षा पर बल दिया है।
गरिमा और प्रतिष्ठात्मक दंड
में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हिरासत में यातना मानव गरिमा का नग्न उल्लंघन है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि हिरासत में मानसिक पीड़ा भी संवैधानिक संरक्षण के दायरे में आती है।
इसी प्रकार, में न्यायालय ने माना कि दोषसिद्धि (यहाँ तक कि मृत्युदंड) के बाद भी मानव गरिमा समाप्त नहीं होती। यदि दोषसिद्धि के बाद भी गरिमा शेष रहती है, तो गिरफ्तारी या आरोप के स्तर पर उसे नकारा नहीं जा सकता।
में भी न्यायालय ने बिना वैधानिक आधार के आरोपियों के पोस्टर लगाने को निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन माना।
डिजिटल युग में यह अपमान स्थायी डिजिटल दाग में बदल जाता है, जो समय के साथ मिटता नहीं।
न्यायालय के बाहर भी निर्दोषिता की प्रत्याशा
में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संदेह, चाहे कितना भी प्रबल हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।
निर्दोषिता की प्रत्याशा केवल साक्ष्य के बोझ तक सीमित नहीं है; यह न्यायालय के बाहर भी लागू होती है। राज्य की कोई भी एजेंसी पूर्वाग्रहपूर्ण दृश्य प्रदर्शन द्वारा दोष का आभास उत्पन्न नहीं कर सकती।
संभावित तर्क और उसका प्रत्युत्तर
यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसे प्रदर्शन समाज में निवारक प्रभाव (deterrence) उत्पन्न करने के लिए आवश्यक हैं। किंतु निवारण दंड का अंग है, जो न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दूसरा तर्क यह हो सकता है कि इससे समाज को यह संदेश जाता है कि राज्य ने कानून-व्यवस्था बहाल कर दी है। किंतु राज्य की वैधता प्रदर्शन से नहीं, विधिक प्रक्रिया के पालन से आती है।
निष्कर्ष: गरिमा और निर्दोषिता की रक्षा
आपराधिक न्याय प्रणाली की वैधता विधिक प्रक्रिया के पालन और संवैधानिक मर्यादाओं में निहित है। आरोपी और दोषसिद्ध के बीच का अंतर कोई औपचारिक तकनीकीता नहीं, बल्कि संवैधानिक आधार है।
यदि गिरफ्तारी को ही दंड में बदल दिया जाए, तो निर्दोषिता की प्रत्याशा अर्थहीन हो जाती है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा और निजता की गारंटी तमाशे या जनभावना के आगे झुक नहीं सकती।
का यह आदेश स्मरण कराता है कि जांच का अधिकार सार्वजनिक अपमान तक विस्तारित नहीं होता। विधि के शासन के प्रति प्रतिबद्ध व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि आपराधिक न्याय प्रदर्शन नहीं, बल्कि न्यायिक निर्णय की प्रक्रिया बना रहे; कि गिरफ्तारी के बाद भी गरिमा सुरक्षित रहे; और दोष का निर्धारण केवल निष्पक्ष सुनवाई के पश्चात ही किया जाए।



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