top of page

किरायेदारों ने बिना अनुमति के किराए की संपत्ति में दो अतिरिक्त मंजिलें बना लीं; इसी कारण मकान मालिक ने उच्च न्यायालय में बेदखली का मुकदमा जीत लिया।

हिंदी अनुवाद:

मकान मालिक ने किरायेदारों को किराये पर स्थान दिया; किरायेदारों ने इमारत में दो मंज़िलें बना लीं और कब्ज़ा कर लिया; हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मकान मालिक की जीत

सार (Synopsis)शिमला में किराये की संपत्ति पर किरायेदारों द्वारा अवैध रूप से बनाई गई दो अतिरिक्त मंज़िलों को गिराने का आदेश हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किराया देने से स्वामित्व का अधिकार नहीं मिलता और मकान मालिक या नगर निगम की अनुमति के बिना किया गया निर्माण अवैध है। मकान मालिकों ने अपनी मालिकाना हक़ और किरायेदारों द्वारा भवन नियमों के उल्लंघन को सफलतापूर्वक सिद्ध किया।

11 नवंबर 2025 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने उस आदेश की पुष्टि की, जिसमें किरायेदारों द्वारा मकान मालिक या नगर निगम से अनुमति लिए बिना बनाए गए दो मंज़िलों को गिराने का निर्देश दिया गया था।

यह फैसला दो भाइयों—राजेश कुमार भगाड़ा और कुलभूषण भगाड़ा—से जुड़े मामले में आया, जो शिमला (हिमाचल प्रदेश) में स्थित संपत्ति के सह-मालिक थे। दलीप चंद गोयल उस मकान के एक हिस्से के किरायेदार थे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ज्वाला देवी को किरायेदारी अधिकार मिले और उनके पुत्र संपत्ति पर काबिज़ रहे।


1989 में सरकार ने सड़क चौड़ीकरण के लिए संपत्ति का अधिग्रहण किया। इसी अवधि के दौरान किरायेदारों ने नगर निगम या मकान मालिक से अनुमति लिए बिना दो मंज़िलें बना लीं। बाद में 1991 में सरकार ने सड़क चौड़ीकरण के लिए केवल संपत्ति का एक हिस्सा लिया और शेष भाग मूल मकान मालिकों को लौटा दिया।

इसके बाद नगर निगम ने अवैध निर्माण पर संज्ञान लेते हुए मुकदमा दायर किया, लेकिन वह खारिज हो गया। इसके परिणामस्वरूप मकान मालिकों ने मुकदमा दायर किया। लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान 2017 में सह-मालिकों में से एक ने अपनी हिस्सेदारी किरायेदारों में से एक को बेच दी, लेकिन बिक्री दस्तावेज़ में अवैध रूप से बनी दो मंज़िलों का कोई उल्लेख नहीं था।

11 नवंबर 2025 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मकान मालिक के परिवार ने मामला जीत लिया। प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता सुमित सूद, मीरा देवी, राहुल शर्मा और दीपक गुप्ता ने पैरवी की।


संपत्ति की पृष्ठभूमि

शुरुआत में यह संपत्ति डॉ. केदार नाथ की थी, जिन्होंने 12 दिसंबर 1949 को बिक्री विलेख के माध्यम से इसे एम/एस तुलसी राम हंस राज (HUF) को बेच दिया।HUF के विभाजन के बाद, 28 मार्च 1977 के विभाजन विलेख से यह संपत्ति श्री अनिल कुमार गोयल के हिस्से में आई। बाद में 17 अक्टूबर 1979 को उन्होंने इसे कुलभूषण भगाड़ा और राजेश कुमार गोयल को बेच दिया।

जमीन पर एक गैराज था, जिसे दो हिस्सों में बांटा गया—एक हिस्सा खाली था और दूसरे हिस्से में आटा चक्की लगी थी। यही हिस्सा आटा चक्की सहित दलीप चंद गोयल को किराये पर दिया गया।

किराये का हिस्सा केवल एक मंज़िला गैराज था, लेकिन किरायेदारों ने नगर निगम की अनुमति या नक्शा स्वीकृति के बिना, नींव मज़बूत किए बिना, उसके ऊपर दो मंज़िलें खड़ी कर दीं।


निर्णय का सार

अलय रज़वी, मैनेजिंग पार्टनर, अकॉर्ड ज्यूरिस, ने ET Wealth Online से कहा कि विवाद शिमला की किराये की संपत्ति से जुड़ा था, जहाँ मकान मालिक की सहमति या नगर निकाय की स्वीकृति के बिना अतिरिक्त मंज़िलें बना दी गई थीं।

मकान मालिकों ने अवैध निर्माण को गिराने के लिए अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने वाद खारिज कर दिया, लेकिन अपीलीय अदालत ने उस निर्णय को पलट दिया, जिसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने माना कि अस्थायी सरकारी अधिग्रहण के बावजूद मकान मालिक–किरायेदार संबंध बना रहा, क्योंकि 1990 तक किराया दिया जाता रहा। आंशिक डी-नोटिफिकेशन के बाद स्वामित्व अधिकार पूर्व प्रभाव से मूल मालिकों में पुनर्जीवित हो गए। निर्माण को अवैध, संरचनात्मक रूप से असुरक्षित और नगर निगम की स्वीकृति से रहित पाया गया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किरायेदारी उत्तराधिकार केवल जीवित पत्नी को मिलता है और उसके निधन के बाद अन्य वारिसों को किरायेदारी का अधिकार नहीं मिलता। किसी भी सह-मालिक को बेदखली या अवैध निर्माण हटाने के लिए मुकदमा दायर करने का अधिकार है, और मुकदमे के दौरान हुई बिक्री वैध रूप से दायर वाद को प्रभावित नहीं करती।


हाईकोर्ट का विश्लेषण

  • किरायेदारों ने अवैध रूप से दो मंज़िलें बनाई थीं।

  • 1989–1991 के अधिग्रहण काल में भी मकान मालिक–किरायेदार संबंध बना रहा।

  • 2017 की बिक्री में अवैध निर्माण का कोई उल्लेख नहीं था।

  • दलीप चंद गोयल की मृत्यु के बाद किरायेदारी केवल उनकी पत्नी ज्वाला देवी को मिली; अन्य वारिस अवैध कब्जेदार माने गए।

  • ज्वाला देवी की मृत्यु के बाद किरायेदारी समाप्त हो गई।


अंतिम निर्णय

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अधिग्रहण से स्वामित्व पर केवल अस्थायी “ग्रहण” (eclipse) लगा था, जो डी-नोटिफिकेशन के बाद समाप्त हो गया। इसलिए किरायेदार अवैध निर्माण को सही ठहराने का कोई अधिकार नहीं रखते।

अदालत ने अपील खारिज करते हुए प्रथम अपीलीय अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें किरायेदारों को किराये की संपत्ति पर बनाई गई दो अवैध मंज़िलें गिराने का निर्देश दिया गया था।


प्रमुख निष्कर्ष

  • अधिग्रहण केवल अस्थायी होता है; डी-नोटिफिकेशन के बाद मालिकाना हक़ पुनर्जीवित हो जाता है।

  • किरायेदारी का उत्तराधिकार पहले और केवल जीवित पति/पत्नी को मिलता है।

  • कोई भी सह-मालिक मुकदमा दायर कर सकता है।

  • बेदखली की कार्यवाही और अवैध निर्माण हटाने के लिए अलग दीवानी मुकदमा साथ-साथ चल सकता है।

 
 
 

Recent Posts

See All
RBI New Rule Over Cheq Bounce Case.

आरबीआई के 2026 के नए नियमों के तहत, यदि किसी चेक के बाउंस होने का मामला सिद्ध होता है, तो संबंधित व्यक्ति को दो साल तक की कैद और चेक की राशि के दोगुने जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। भारतीय रिज़र्व बैंक

 
 
 

Comments


Gopal Nagar,3rd Bus Stop, Nagpur -440022

Call : 0091-9372390048

Whatsapp 9372390048

© 2023 by

Advisor & co.

Proudly created by Advocate Sandeep Pandey

  • facebook
  • Twitter Clean
  • Instagram
  • Blogger
bottom of page