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बैंक द्वारा नीलाम की गई संपत्ति के खरीदार को भारी बकाया बिलों का पता चला, बैंक के खिलाफ केस किया लेकिन हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली; खरीदारों के लिए सबक

सारांश (Synopsis)

बैंक की ई-नीलामी के जरिए खरीदी गई संपत्ति पर पानी और आरडब्ल्यूए (रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) के भारी बकाया बिल सामने आने के बाद एक होमबायर को इलाहाबाद हाईकोर्ट से झटका लगा। कोर्ट ने कहा कि नीलामी में बोली लगाने से पहले सभी बकाया और देनदारियों की जांच करना खरीदार की जिम्मेदारी है। बैंक ने संपत्ति “जैसी है, जहां है” (as is where is) आधार पर बेची थी, इसलिए खरीदार पर ही पूरी ड्यू डिलिजेंस की जिम्मेदारी थी।

यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर एक रिट याचिका में सुनाया गया, जो होमबायर श्री सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल की थी। उन्होंने बैंक के खिलाफ निर्देश मांगे थे, क्योंकि पानी की सप्लाई समेत कई बकाया बिल सामने आए थे। ये समस्याएं उन्हें उस संपत्ति की बिक्री के बाद पता चली, जिसे उन्होंने SARFAESI ई-नीलामी के जरिए खरीदा था।

श्री सिंह की शिकायत थी कि सोसायटी के बकाया शुल्क (society dues) पहले के मालिक के समय से जमा थे, जिनका खुलासा न तो बैंक ने नीलामी के समय किया और न ही उन्हें कब्जा लेने से पहले इसकी जानकारी थी। उनका मुख्य तर्क था कि ये देनदारियां किसी भी एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट में दर्ज नहीं थीं, इसलिए उन्होंने कोर्ट का रुख किया।

मामले के तथ्य यह हैं कि श्री सिंह और उनके बेटे को फ्लैट का सबसे ऊंचा बोलीदाता घोषित किया गया और 6 अप्रैल 2024 को बैंक ने उनके पक्ष में बिक्री प्रमाणपत्र (Sale Certificate) जारी किया। यह संपत्ति बैंक द्वारा 6 दिसंबर 2023 को प्रकाशित बिक्री नोटिस के अनुसार SARFAESI एक्ट के तहत ई-नीलामी में बेची गई थी।

बिक्री के बाद जब श्री सिंह ने फ्लैट का कब्जा लिया, तो उन्हें पता चला कि पानी की सप्लाई काट दी गई है। इसके बाद उन्होंने 28 मार्च 2024 और 13 मई 2024 को आरडब्ल्यूए को पत्र लिखकर पानी की सप्लाई बहाल करने का अनुरोध किया।

इसके अलावा, श्री सिंह ने 14 अक्टूबर 2024 को बैंक को भी एक प्रतिनिधित्व (पत्र) भेजा, जिसमें कहा कि नीलामी के समय बैंक ने किसी भी बकाया सोसायटी शुल्क का उल्लेख नहीं किया था और न ही बिक्री पत्र में यह जानकारी दी गई थी। जवाब में बैंक ने कहा कि उसने यह संपत्ति 27 दिसंबर 2023 की ई-नीलामी के जरिए “as is where is”, “as is what is” और “whatever there is” आधार पर बेची थी।

आरडब्ल्यूए (सोसायटी) ने भी नीलामी से पहले श्री सिंह को किसी बकाया शुल्क की जानकारी नहीं दी थी, जिसके कारण वह इन देनदारियों से अनजान रहे। बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी सोसायटी शुल्क के लिए जिम्मेदार नहीं है।

श्री सिंह के वकीलों ने बताया कि उन्होंने 15 अक्टूबर 2024 और 27 नवंबर 2024 को उप-निबंधक (Sub-Registrar), रजिस्ट्रार ऑफ सोसायटीज एंड चिट्स, आगरा को भी पत्र भेजे। इन पत्रों में कहा गया कि कब्जा और रजिस्ट्री के बाद उन्हें पता चला कि फ्लैट की पानी की सप्लाई कटी हुई है। कई बार अनुरोध के बावजूद पानी की सप्लाई बहाल नहीं की गई, जिससे उनकी बुनियादी जरूरतें प्रभावित हो रही थीं। साथ ही, जब उन्होंने देनदारियों के बारे में पूछा था, तब उन्हें सोसायटी शुल्क की जानकारी नहीं दी गई।

वकीलों के अनुसार, बैंक ने न तो ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ प्राप्त किया और न ही उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और अनुरक्षण का प्रोत्साहन) अधिनियम, 2010 के तहत पंजीकृत विलेख पर हस्ताक्षर करने से पहले इसके लिए आवेदन किया।

श्री सिंह के वकील ने यह भी दलील दी कि बैंक को ई-नीलामी से पहले सोसायटी से एनओसी (NOC) लेनी चाहिए थी। इसलिए बैंक अब यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसने संपत्ति “as is where is”, “as is what is” और “whatever there is” आधार पर बेची।

इसके अलावा, उन्होंने कोर्ट को बताया कि बिक्री प्रमाणपत्र (सेल डीड) के अनुच्छेद 18 में यह कहा गया था कि संपत्ति किसी भी भार (encumbrance) से मुक्त है, जबकि वास्तविकता में बैंक ने इसका पालन नहीं किया।

खैतान एंड कंपनी के पार्टनर अवनीश शर्मा का विश्लेषणअवनीश शर्मा ने बताया कि श्री सिंह केस इसलिए हार गए क्योंकि कोर्ट ने माना कि जब किसी संपत्ति को बैंक नीलामी में “as is where is”, “as is what is” और “whatever there is” आधार पर बेचा जाता है, तो खरीदार पर यह पूरी जिम्मेदारी होती है कि वह संपत्ति से जुड़ी सभी देनदारियों और भारों की जांच करे।

उन्होंने आगे कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि बैंक केवल उन्हीं “ज्ञात भारों” (known encumbrances) का खुलासा करने के लिए बाध्य हैं, जो नीलामी के समय उन्हें पता हों। बैंक रखरखाव शुल्क, पानी-बिजली के बकाया या अन्य सोसायटी देनदारियों के लिए जिम्मेदार नहीं है, जब तक कि ये देनदारियां बैंक को पहले से ज्ञात न हों और जानबूझकर छिपाई न गई हों। इस मामले में खरीदार ने बोली लगाने से पहले आरडब्ल्यूए और स्थानीय प्राधिकरणों से जांच नहीं की, इसलिए कोर्ट ने बैंक को दोषी नहीं माना।

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए दो प्रमुख मुद्दे

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले (WRIT - C No. 35952 of 2025, दिनांक 15 अक्टूबर 2025) में कहा कि रिकॉर्ड देखने और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद निम्नलिखित मुद्दे विचारणीय हैं:

  1. क्या “as is where is”, “as is what is” और “whatever there is” आधार पर हुई ई-नीलामी के बाद सामने आई सोसायटी देनदारियों के लिए बैंक जिम्मेदार है?

  2. क्या इस आधार पर संपत्ति खरीदने के बाद, और उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम, 2010 के प्रावधानों के उल्लंघन का बाद में पता चलने पर, याचिकाकर्ता अनुच्छेद 226 के तहत राहत मांग सकता है?

कोर्ट ने दोनों ही मुद्दों पर याचिकाकर्ता के खिलाफ फैसला दिया।

कोर्ट का निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति यह जानते हुए नीलामी में भाग लेता है कि संपत्ति “as is where is” आधार पर बेची जा रही है, तो सभी बकाया और देनदारियों की जांच करना उसी की जिम्मेदारी है। बैंक पर कोई दायित्व नहीं बनता। इसलिए याचिका खारिज की जाती है, हालांकि याचिकाकर्ता को उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम, 2010 के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी गई।

बैंक ई-नीलामी में संपत्ति खरीदने वालों के लिए मुख्य सबक

  • बोली लगाने से पहले स्वतंत्र रूप से ड्यू डिलिजेंस करें।

  • सोसायटी, बिजली-पानी विभाग और नगर निकायों से बकाया की जांच करें।

  • “as is where is” शर्त का अर्थ समझें — बाद में बैंक से दावा नहीं किया जा सकता।

  • जहां संभव हो, नो ड्यूज सर्टिफिकेट प्राप्त करें।

  • संभावित बकाया को बोली मूल्य में शामिल कर लें।

(मूल रूप से 11 नवंबर 2025 को प्रकाशित)

 
 
 

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