सुप्रीम कोर्ट का आदेश: ड्रग्स एक्ट के चैप्टर-IV के मामलों का मुकदमा केवल सेशंस कोर्ट में ही चलेगा
- Advocate Sandeep Pandey
- Feb 21
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दिल्ली, 21 फरवरी 2026 – सुप्रीम कोर्ट ने आज स्पष्ट किया है कि
📌 ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के चैप्टर-IV (उत्पादन और बिक्री से जुड़े अपराध) से संबंधित मामलों की मुकदमा-सुनवाई केवल सेशंस कोर्ट (Sessions Court) में ही हो सकेगी, न कि मैजिस्ट्रेट कोर्ट में।
बेंच ने कहा कि एक्ट की धारा 32(2) स्पष्ट रूप से तय करती है कि इन अपराधों का परीक्षण कोर्ट ऑफ सेशन या उससे ऊपर के स्तर पर ही किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने एम/एस एसबीएस बायोटेक और साझेदारों की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने मुकदमे को रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि आरोप समयसीमा के भीतर दायर किए गए हैं और यह मामला सीधे सेशंस कोर्ट में सुनवाई के योग्य है।
यह मामला हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित एक दवा निर्माता के खिलाफ रिकॉर्ड रखरखाव और नियमों के उल्लंघन के आरोप से जुड़ा था।
In details
नई दिल्ली – M/S SBS Biotech & Others v. State of Himachal Pradesh (SLP (Crl.) No. 9281/2025)
मामला 22 जुलाई 2014 को के सिरमौर जिले के काला अंब स्थित M/s SBS Biotech के विनिर्माण परिसर में ड्रग इंस्पेक्टर द्वारा की गई जांच से जुड़ा है। आरोप था कि फर्म ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के शेड्यूल M और शेड्यूल U के तहत आवश्यक रिकॉर्ड का सही रखरखाव नहीं किया, विशेषकर ‘Pseudoephedrine’ दवा के संबंध में। पुनः निरीक्षण में निर्माण, परीक्षण और वितरण रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितताएं और कथित हेरफेर सामने आए।
15 सितंबर 2016 को अभियोजन की स्वीकृति के बाद 27 फरवरी 2017 को शिकायत दायर की गई, जिसमें धारा 18(a)(vi), 18-B सहित अन्य प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया, जो धारा 27(d) और 28-A के तहत दंडनीय हैं। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेने के बाद मामला सेशंस कोर्ट को भेज दिया।
अपीलकर्ता ने दलील दी कि मामला केवल रिकॉर्ड संधारण से संबंधित है, जिस पर अधिकतम एक वर्ष की सजा है, इसलिए शिकायत समयसीमा से बाहर है और इसे मजिस्ट्रेट द्वारा ही सुना जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि शिकायत में धारा 18(a)(vi) के उल्लंघन के गंभीर आरोप हैं, जिन पर धारा 27(d) के तहत एक से दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 के तहत तीन वर्ष की सीमा लागू होगी और शिकायत समयसीमा के भीतर है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब धारा 32(2) चैप्टर-IV के अपराधों की सुनवाई सेशंस कोर्ट द्वारा अनिवार्य करती है, तो धारा 36-A के आधार पर मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं दिया जा सकता।
इस प्रकार, हाईकोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।



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