सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब किसी अनुबंध के निष्पादन में खरीदार और विक्रेता—दोनों की ही गलती हो, तो खरीदार द्वारा जमा की गई अग्रिम राशि (अर्नेस्ट मनी) की जब्ती का आदेश देना स्वीकार्य नहीं होगा
- Advocate Sandeep Pandey
- 5 days ago
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सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब किसी अनुबंध के निष्पादन में खरीदार और विक्रेता—दोनों की ही गलती हो, तो खरीदार द्वारा जमा की गई अग्रिम राशि (अर्नेस्ट मनी) की जब्ती का आदेश देना स्वीकार्य नहीं होगा, क्योंकि इससे विक्रेता को अनुचित लाभ (अनुचित समृद्धि) प्राप्त होगी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने खरीदार की उस अपील पर सुनवाई की, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी, जिसने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) की डिक्री को खरीदार की तत्परता और इच्छा (Readiness and Willingness) के अभाव में निरस्त करते हुए अग्रिम राशि की जब्ती की अनुमति दी थी।
यह विवाद 22 जनवरी 2008 को अशोक विहार, दिल्ली स्थित 300 वर्ग गज की संपत्ति को ₹6.11 करोड़ में बेचने के लिए किए गए समझौते से उत्पन्न हुआ था। खरीदार ने ₹60 लाख अग्रिम राशि के रूप में तथा बाद में ₹30 लाख का अतिरिक्त भुगतान किया था। फरवरी 2021 में ट्रायल कोर्ट ने विशिष्ट निष्पादन की डिक्री पारित की थी, किंतु सितंबर 2025 में हाईकोर्ट ने इस निर्णय को पलटते हुए यह माना कि खरीदार शेष ₹5.21 करोड़ का भुगतान करने की अपनी वित्तीय क्षमता सिद्ध करने में असफल रहा। हाईकोर्ट ने अग्रिम राशि की जब्ती की अनुमति दी, जबकि अतिरिक्त ₹30 लाख की राशि ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया।
अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, न्यायमूर्ति नाथ द्वारा लिखित निर्णय में तत्परता और इच्छा के संबंध में हाईकोर्ट के निष्कर्षों को बरकरार रखा गया, किंतु अग्रिम राशि की जब्ती की अनुमति देने के निर्देश से असहमति व्यक्त की गई। न्यायालय ने कहा कि जहाँ दोनों पक्ष दोषी हों, वहाँ न्यायसंगतता (Equity) का सिद्धांत अनुचित समृद्धि को रोकने के लिए लागू होना चाहिए।
इस मामले में, खरीदार अपनी तत्परता और इच्छा सिद्ध करने में असफल रहा, वहीं विक्रेता संपत्ति के म्यूटेशन (Mutation) तथा लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में रूपांतरण (Conversion) से संबंधित अनुबंधीय दायित्वों को पूरा करने में विफल रहा। अतः दोनों पक्षों की गलती पाई गई।
न्यायालय ने कहा— “यह एक स्थापित सिद्धांत है कि न्यायसंगतता इस प्रकार कार्य करे कि अनुचित समृद्धि को रोका जा सके और जहाँ तक संभव हो, विशेष रूप से तब जब दोनों पक्ष दोषी हों, उन्हें उनकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए। अतः हम इस मत पर हैं कि अग्रिम राशि की जब्ती का निर्देश देना प्रतिवादियों को अनुचित लाभ प्रदान करेगा।”
आगे न्यायालय ने कहा— “अतः पूर्ण न्याय करने और पक्षकारों के बीच न्यायसंगत संतुलन स्थापित करने के लिए, हमारा सुविचारित मत है कि उपयुक्त मार्ग यह है कि प्रतिवादियों को इस आदेश की तिथि से चार सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को ₹3,00,00,000/- (तीन करोड़ रुपये मात्र) की एकमुश्त राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया जाए। इससे अपीलकर्ता की पूर्ण प्रतिपूर्ति हो जाएगी, अनुबंध से संबंधित आगे की जटिलताओं से बचा जा सकेगा और एक दशक से अधिक समय से लंबित इस विवाद का अंत होगा। हाईकोर्ट का निर्णय उपर्युक्त सीमा तक संशोधित माना जाएगा।”
वाद शीर्षक (Cause Title):
सुभाष अग्रवाल बनाम महेंद्र पाल छाबड़ा एवं अन्य


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