आरक्षित अभ्यर्थी और सामान्य कोटा: समानता के सिद्धांत पर पुनर्विचार की आवश्यकता
- Advocate Sandeep Pandey
- Jan 4
- 5 min read
Updated: 5 days ago

आरक्षण और मेरिट की दोहरी व्यवस्था: समानता के नाम पर असमानता?
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता और समान अवसर का वचन देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है और अनुच्छेद 16 सरकारी सेवाओं में समान अवसर की गारंटी देता है। किंतु हाल के वर्षों में भर्ती प्रक्रियाओं में विकसित हो रही एक प्रवृत्ति इन संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है।
आज स्थिति यह बन रही है कि एक ही अभ्यर्थी को आरक्षित श्रेणी का लाभ भी प्राप्त है और यदि उसके अंक सामान्य कट-ऑफ से ऊपर हों, तो उसे सामान्य श्रेणी की सीट पर भी दावा करने की अनुमति मिल जाती है। यह व्यवस्था पहली नज़र में मेरिट का सम्मान प्रतीत होती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह दोहरी सुविधा का रूप ले लेती है।
दो नावों पर पैर रखने की व्यवस्था
आरक्षण व्यवस्था को संविधान ने एक विशेष और संरक्षित श्रेणी के रूप में स्वीकार किया है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को समान स्तर पर लाना है। यह एक सुधारात्मक उपाय है, न कि स्थायी विशेषाधिकार। जब कोई अभ्यर्थी आरक्षित श्रेणी के अंतर्गत आवेदन करता है, तो वह स्वयं को उस विशेष संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत रखता है।
ऐसे में उसी चयन प्रक्रिया, उसी पद और उसी क्षेत्र में उस अभ्यर्थी को सामान्य श्रेणी में भी प्रतिस्पर्धा की अनुमति देना ऐसा है, जैसे एक व्यक्ति को दो अवसर और दूसरे को केवल एक सीमित अवसर प्रदान किया जा रहा हो। यदि अंक कम हों तो आरक्षित सीट सुरक्षित, और यदि अंक अधिक हों तो सामान्य सीट पर दावा—यह स्थिति न तो नैतिक है और न ही संवैधानिक समानता की भावना के अनुरूप।
समान अवसर या असमान विशेषाधिकार?
अनुच्छेद 16 समान अवसर की बात करता है, लेकिन समान अवसर का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी एक वर्ग को अधिक अवसर उपलब्ध कराए जाएँ। जब सामान्य श्रेणी का अभ्यर्थी केवल खुली प्रतिस्पर्धा तक सीमित रहता है और आरक्षित श्रेणी का अभ्यर्थी दो स्तरों पर चयन की संभावना रखता है, तो यह समानता नहीं बल्कि संरचित असमानता बन जाती है।
यह व्यवस्था सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों के अधिकारों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अतिक्रमण है और साथ ही आरक्षण के मूल उद्देश्य को भी कमजोर करती है। आरक्षण का लक्ष्य सशक्तिकरण है, प्रतिस्पर्धा में दोहरा लाभ नहीं।
सामाजिक संतुलन के लिए खतरा
इस प्रकार की दोहरी व्यवस्था समाज में असंतोष और विभाजन को जन्म देती है।
जब अवसरों की प्रणाली निष्पक्ष प्रतीत नहीं होती, तो सामाजिक विश्वास कमजोर होता है। यह एक ऐसी खतरनाक विभेदीय स्थिति को जन्म देती है जहाँ अधिकारों की रक्षा के बजाय अधिकारों की टकराहट शुरू हो जाती है।
राजनीति, वोट बैंक और विभाजन
यह भी अस्वीकार्य सत्य नहीं है कि आरक्षण नीति को समय-समय पर राजनीतिक हितों और वोट बैंक की दृष्टि से संचालित किया गया है। परिणामस्वरूप, सामाजिक न्याय की यह संवैधानिक अवधारणा कहीं न कहीं विभाजन की राजनीति का औज़ार बनती जा रही है। यह प्रवृत्ति ब्रिटिश काल की “फूट डालो और राज करो” नीति की आधुनिक पुनरावृत्ति जैसी प्रतीत होती है।
निष्कर्ष
आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उसे दोहरी पात्रता में बदल देना न तो समानता के सिद्धांत के अनुकूल है और न ही सामाजिक न्याय के दीर्घकालिक हित में। समय आ गया है कि नीति-निर्माता और न्यायिक व्याख्याएँ इस प्रश्न पर गंभीर पुनर्विचार करें कि समान अवसर और विशेष संरक्षण के बीच संतुलन कहाँ टूट रहा है।
समानता केवल काग़ज़ों पर नहीं, बल्कि अवसरों की वास्तविक संरचना में दिखनी चाहिए—अन्यथा “समानता” स्वयं असमानता का दूसरा नाम बन जाएगी।
Latest suprim court judgment on 19 Dec 2025
Rajsthan high court vs. Rajat Yadav & others
Case Number. SC. 14112 of 2024
✍️ लेखक: एडवोकेट संदीप पांडेय
वेबसाइट: www.advpandey.com
Details.
सुप्रीम कोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 को एक अहम फैसला दिया है
जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि आरक्षित श्रेणी (SC/ST/OBC/EWS) के उम्मीदवार, जिन्होंने सामान्य (ओपन/अनारक्षित) श्रेणी के कट-ऑफ अंक से अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें उसी स्तर पर सामान्य/ओपन कैटेगरी की सीटों के लिए भी माना जाए।
यह मान्यता केस नंबर SC:14112 of 2024 के संदर्भ में दी गई है (निर्णय का प्रकाशन लाइव लॉ रिपोर्ट सहित उपलब्ध है) और इस निर्णय को राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्णय की पुष्टि के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने बहुपक्षीय भर्ती प्रक्रिया में मेरिट-आधारित चयन के सिद्धांत को लागू करने के लिए अपनाया है।
यहाँ इस फैसले के मुख्य बिंदु और कानूनी तर्क को संक्षेप में समझाया गया है:
📌 1. सामान्य/ओपन श्रेणी पूरी तरह से मेरिट-आधारित है
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि “ओपन”, “अनारक्षित” या “सामान्य” श्रेणी से प्रकाशित रिक्तियाँ किसी विशेष वर्ग के लिए आरक्षित नहीं हैं और इन पर सभी योग्य उम्मीदवार, चाहे वे किसी भी सामाजिक वर्ग से हों, शामिल हो सकते हैं — केवल मेरिट के आधार पर।”
इसका अर्थ यह है कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार कोई विशेष छूट/आरक्षण लाभ लिए बिना सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे ओपन कैटेगरी की मेरिट लिस्ट में स्थान दिया जाना चाहिए।
📌 2. आरक्षित श्रेणी में आवेदन और सामान्य (ओपन) कट-ऑफ
बहुत से भर्ती नियमों में उम्मीदवार आवेदन करते समय अपनी श्रेणी (आरक्षित/अनारक्षित) का चुनाव करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि किसी अभ्यर्थी ने आरक्षित श्रेणी में आवेदन किया था, यह नहीं माना जाना चाहिए कि वह सामान्य कट-ऑफ पर विचार किए जाने योग्य नहीं है अगर उसके अंक सामान्य कट-ऑफ से ऊपर हैं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य कैटेगरी मेरिट-आधारित है और वह किसी खास समुदाय के लिए “आरक्षण” नहीं है।
📌 3. “डबल लाभ” का तर्क खारिज
निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने “डबल लाभ” (Double Benefit) के तर्क को खारिज कर दिया कि यदि आरक्षित उम्मीदवार सामान्य सूची में शामिल हो जाता है तो उसे दो बार लाभ मिलेगा। अदालत ने कहा कि यह दुरूपयोग नहीं है, बल्कि सिर्फ मेरिट के अनुसार समान प्रतिस्पर्धा का परिणाम है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य सूची में शामिल होना किसी अतिरिक्त आरक्षण लाभ का मतलब नहीं है — यह केवल इस बात को दर्शाता है कि उम्मीदवार ने बिना किसी खास छूट का उपयोग किए भी सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए हैं, इसलिए वह सामान्य/ओपन श्रेणी की प्रतियोगिता के योग्य है।
📌 4. भर्ती प्रक्रिया का क्रम – मेरिट लिस्ट पहले, फिर श्रेणी-वार सूची
राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार — और सुप्रीम कोर्ट ने इसकी पुष्टि की — पहले सामान्य/ओपन मेरिट सूची तैयार की जानी चाहिए जिसमें आरक्षित वर्ग के वह उम्मीदवार भी शामिल हों जो सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करते हैं। उसके बाद आरक्षित वर्गों की अलग-अलग सूचियाँ तैयार की जानी चाहिए, जिनमें पहले से ओपन सूची में शामिल आरक्षित उम्मीदवारों को शामिल नहीं किया जाएगा।
📌 5. मुख्य संवैधानिक आधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सरकारी सेवाओं में समान अवसर) का हवाला देते हुए कहा कि:
सामान्य श्रेणी के पदों को सिर्फ इसलिए आरक्षित कोटे के लिए अलग रखना कि वे आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य सूची से बाहर कर दें, संवैधानिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
यदि कोई उम्मीदवार सामान्य कट-ऑफ से ऊपर है, तो उसे सहायक भर्ती प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए।
📌 6. निर्णय का संभावित प्रभाव
यह निर्णय महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि इससे: ✔️ मेरिट-आधारित चयन को प्राथमिकता मिलेगी;
✔️ सामान्य (ओपन) सूची में आरक्षित वर्ग के योग्य उम्मीदवार भी शामिल होंगे;
✔️ आज के भर्ती परिदृश्य में “ओपन कैटेगरी” को सूचक शब्द के रूप में वही माना जाएगा — जहाँ जाति/समुदाय का हिसाब नहीं रखा जाता;
✔️ भर्ती की प्रक्रियाओं में निष्पक्षता और समानता की भावना मजबूत होगी।
📌 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के SC:14112 of 2024 (19 दिसंबर 2025) के निर्णय के अनुसार: 🔹 आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार सामान्य (ओपन/अनारक्षित) कट-ऑफ से ऊपर अंक प्राप्त करने पर सामान्य सूची में शामिल होने के हकदार हैं;
🔹 सामान्य श्रेणी के पद किसी विशेष सामाजिक समूह के लिए आरक्षित नहीं हैं;
🔹 सामान्य सूची में शामिल होने का मतलब डबल लाभ नहीं, बल्कि समग्र मेरिट का सम्मान है;
🔹 इससे भर्ती प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 की भावना मजबूत होती है।


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