एसबीआई ने “गुम” की हुई प्रॉपर्टी की मूल रजिस्ट्री आखिरकार खोज निकाली, लेकिन तब जब उपभोक्ता आयोग ने ₹10 लाख जमा करने का आदेश दिया — अधिवक्ता संदीप पांडे
- Advocate Sandeep Pandey
- May 27
- 3 min read
Updated: May 28
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक State Bank of India (SBI) से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें बैंक ने ग्राहक की प्रॉपर्टी की मूल टाइटल डीड (रजिस्ट्री) वर्षों तक “गुम” बताई, लेकिन जैसे ही राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) ने बैंक को ₹10 लाख जमा करने का आदेश दिया, बैंक को अचानक वह दस्तावेज “मिल” गया।
मामला उत्तर प्रदेश के निवासी विनय कुमार से जुड़ा है, जिन्होंने बैंक से ऋण लिया था और सुरक्षा के रूप में अपनी संपत्ति के मूल दस्तावेज SBI के पास जमा किए थे। ऋण चुकाने के बाद जब उन्होंने अपनी मूल रजिस्ट्री वापस मांगी तो बैंक ने बताया कि दस्तावेज “ट्रेस नहीं हो रहे” हैं। इसके बाद पीड़ित को वर्षों तक न्याय के लिए आयोगों के चक्कर लगाने पड़े।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने 3 अक्टूबर 2022 को SBI को निर्देश दिया था कि वह छह माह के भीतर मूल दस्तावेज वापस करे या फिर संपत्ति के अनुमानित मूल्य ₹65 लाख का भुगतान करे। इसके अलावा मानसिक पीड़ा और लापरवाही के लिए ₹10 लाख मुआवजा भी देने का आदेश दिया गया।
बैंक इस आदेश के खिलाफ NCDRC पहुंचा। सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि SBI यह साबित नहीं कर पाया कि उसने कभी ग्राहक को प्रमाणित प्रति (Certified Copy) उपलब्ध कराई थी। 13 जनवरी 2026 को NCDRC ने SBI को चार सप्ताह के भीतर ₹10 लाख जमा करने का आदेश दिया और चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई तक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए तो ₹65 लाख की राशि भी जमा करनी पड़ेगी।
इसके बाद घटनाक्रम ने नाटकीय मोड़ लिया। 28 अप्रैल 2026 को SBI ने आयोग के समक्ष आवेदन देकर कहा कि उसे मूल टाइटल डीड “मिल गई” है। बैंक के अधिकारी मूल दस्तावेज लेकर आयोग में उपस्थित हुए। हालांकि आयोग ने बैंक के इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। आयोग ने कहा कि दस वर्षों तक बैंक ने दस्तावेज खोजने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया और केवल तब दस्तावेज सामने आए जब आयोग ने आर्थिक दंड लगाने का आदेश दिया।
NCDRC ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि किसी बैंक द्वारा ग्राहक की मूल संपत्ति दस्तावेज खो देना “सेवा में घोर कमी” (Gross Deficiency in Service) है। आयोग ने माना कि मूल दस्तावेज न होने से संपत्ति की बाजार कीमत प्रभावित होती है और भविष्य में उस संपत्ति पर ऋण प्राप्त करना भी कठिन हो जाता है।
कानूनी दृष्टि से यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत बैंक एक “सेवा प्रदाता” है और ग्राहक के मूल दस्तावेजों की सुरक्षा उसकी कानूनी जिम्मेदारी है। यदि बैंक लापरवाही से दस्तावेज खो देता है तो ग्राहक मानसिक पीड़ा, आर्थिक नुकसान और संपत्ति मूल्य में कमी के लिए मुआवजा मांग सकता है। सुप्रीम एवं राष्ट्रीय आयोग पहले भी कई मामलों में बैंकों को भारी क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे चुके हैं।
RBI ने भी 2023 में निर्देश जारी किए थे कि ऋण समाप्त होने के 30 दिनों के भीतर बैंक को मूल संपत्ति दस्तावेज लौटाने होंगे। यदि बैंक ऐसा नहीं करता या दस्तावेज खो देता है, तो उसे ग्राहक की सहायता कर प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध करानी होंगी तथा प्रतिदिन जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
यह मामला उन लाखों बैंक ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो अपने मूल दस्तावेज बैंकों के पास जमा करते हैं। यदि कोई बैंक दस्तावेज लौटाने में टालमटोल करता है या उन्हें गुम कर देता है, तो ग्राहक उपभोक्ता आयोग, बैंकिंग लोकपाल और न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
— अधिवक्ता संदीप पांडे





Comments