बहू को ससुराल की संपत्ति में स्थायी वैकल्पिक आवास का अधिकार नहीं : दिल्ली हाईकोर्ट
- Advocate Sandeep Pandey
- 2 days ago
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अधिवक्ता संदीप पांडेय
लीगल कंसल्टेंट एवं प्रैक्टिशनर, नागपुर जिला न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
हाल ही में Delhi High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (DV Act) तथा Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के अंतर्गत बहू को ससुराल पक्ष की संपत्ति में “स्थायी वैकल्पिक आवास” (Permanent Alternate Accommodation) मांगने का कोई पूर्ण या स्थायी अधिकार प्राप्त नहीं है। न्यायालय ने कहा कि कानून केवल “Shared Household” में निवास के संरक्षण का अधिकार देता है, न कि संपत्ति पर स्थायी कब्जे या स्वामित्व का।
यह मामला ऐसे वृद्ध माता-पिता से संबंधित था जिन्होंने अपने पुत्र और बहू द्वारा मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अंतर्गत राहत मांगी थी। जिला मजिस्ट्रेट ने बहू एवं पुत्र को मकान खाली करने का आदेश दिया। बाद में अपीलीय प्राधिकारी ने यह निर्देश दिया कि वृद्ध दंपत्ति बहू और उसके बच्चों के लिए स्थायी वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराएं। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि DV Act का उद्देश्य किसी महिला को बेघर होने से बचाना है, लेकिन यह अधिनियम उसे किसी विशेष संपत्ति पर स्थायी रूप से रहने का अपरिवर्तनीय अधिकार नहीं देता। न्यायालय ने यह भी माना कि वरिष्ठ नागरिकों को अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति में शांति और गरिमा के साथ रहने का मौलिक अधिकार है। यदि पारिवारिक संबंध अत्यधिक तनावपूर्ण हो जाएं और साथ रहना असंभव हो जाए, तो अदालत संतुलन बनाते हुए वैकल्पिक व्यवस्था कर सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बहू के भरण-पोषण और आवास की प्राथमिक जिम्मेदारी उसके पति की होती है, न कि वृद्ध सास-ससुर की। हालांकि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए न्यायालय ने बहू को प्रति माह ₹25,000 साझा आवास हेतु तथा ₹5,000 अतिरिक्त भरण-पोषण राशि देने का निर्देश दिया। साथ ही चार माह की अग्रिम राशि जमा करने का आदेश भी दिया गया।
यह निर्णय पारिवारिक विवादों में एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है। एक ओर महिला के आवास और सुरक्षा के अधिकार को स्वीकार किया गया है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन और संपत्ति अधिकारों की भी रक्षा की गई है। न्यायालय ने यह संदेश दिया कि “Shared Household” का अधिकार असीमित या स्थायी संपत्ति अधिकार नहीं बन सकता।
कानूनी दृष्टि से यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहां घरेलू हिंसा अधिनियम और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अधिकार आपस में टकराते हैं।





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