एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
- Advocate Sandeep Pandey
- Mar 10
- 3 min read
सरकारों से पूछा – सरकारी नौकरी देकर पुनर्वास योजना क्यों नहीं?
नई दिल्ली, 9 मार्च 2026 .
सुप्रीम कोर्ट ने देश में एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर केंद्र और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों से महत्वपूर्ण सवाल पूछा है। अदालत ने पूछा कि एसिड अटैक सर्वाइवर्स को सरकारी या सरकारी नियंत्रण वाले संस्थानों में रोजगार देने के लिए अब तक कोई ठोस पुनर्वास योजना क्यों नहीं बनाई गई है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि यदि सरकारों को सीधे सरकारी नौकरी देने में प्रशासनिक कठिनाई है, तो वे पीड़ितों के लिए जीविका भत्ता (subsistence allowance) के बराबर मानदेय देने की योजना तैयार करें।
यह सुनवाई एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीन मलिक द्वारा दायर याचिका पर की जा रही है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता शाहीन मलिक पर वर्ष 2009 में एसिड हमला हुआ था। याचिका में यह भी बताया गया कि कई मामलों में पीड़ितों को जबरन एसिड पिलाया जाता है, जिससे उन्हें लंबे समय तक गंभीर शारीरिक विकलांगता झेलनी पड़ती है।
इस मामले में:
घटना हरियाणा से संबंधित थी
उपचार के कारण मामला दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में स्थानांतरित हुआ
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया
जिसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की गई है
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा को प्रो बोनो एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:
1. एसिड अटैक मामलों का राष्ट्रीय डेटा
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया कि वे निम्न जानकारी कोर्ट में प्रस्तुत करें:
वर्षवार एसिड हमलों की संख्या
चार्जशीट की स्थिति
लंबित मुकदमे और अपील
प्रत्येक पीड़ित की शिक्षा, रोजगार और वैवाहिक स्थिति
इलाज और पुनर्वास पर राज्य द्वारा खर्च की गई राशि
2. जबरन एसिड पिलाने के मामलों की अलग जानकारी
कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में पीड़ित को एसिड पीने के लिए मजबूर किया गया, उनकी अलग से जानकारी दी जाए।
3. लंबित मुकदमों के शीघ्र निपटान का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से कहा कि:
एसिड अटैक मामलों के ट्रायल को प्राथमिकता दी जाए
तय समयसीमा में मुकदमों का निपटारा किया जाए
प्रशासनिक न्यायाधीश इसकी निगरानी करें।
विकलांगता कानून में संशोधन पर विचार
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि जबरन एसिड पिलाने वाले मामलों को भी “दिव्यांगता” की श्रेणी में शामिल किया जाए।
वर्तमान में Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 की अनुसूची में केवल “acid throwing” का उल्लेख है, जबकि acid administering (जबरन पिलाना) स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है।
अदालत ने कहा कि दोनों कानूनों में समानता (parity) लाना आवश्यक है।
एसिड अटैक मामलों से संबंधित प्रमुख कानूनी प्रावधान
1. भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता
धारा 326A IPC / BNS – एसिड हमला कर गंभीर चोट पहुँचाना
धारा 326B IPC / BNS – एसिड फेंकने का प्रयास
इन अपराधों में कठोर सजा और भारी जुर्माना का प्रावधान है।
2. पीड़ित मुआवजा योजना
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में निर्देश दिया था कि:
एसिड पीड़ित को कम से कम ₹3 लाख मुआवजा दिया जाए
₹1 लाख तुरंत उपचार के लिए
शेष ₹2 लाख पुनर्वास के लिए दिया जाए।
3. मुफ्त इलाज का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार:
सभी अस्पतालों को एसिड पीड़ितों को मुफ्त इलाज, दवा और सर्जरी देना अनिवार्य है।
4. एसिड की बिक्री पर नियंत्रण
अदालत ने एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगाते हुए निर्देश दिया कि:
खरीददार की पहचान दर्ज की जाए
18 वर्ष से कम आयु वालों को बिक्री न हो।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ऐसे अपराधों से निपटने के लिए “पर्याप्त और प्रभावी वैधानिक व्यवस्था” (adequate statutory regime) होना आवश्यक है।
कोर्ट ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे यह बताएं कि सरकारी नौकरी आधारित पुनर्वास योजना क्यों लागू नहीं की जानी चाहिए।
मामला
Shaheen Malik v. Union of India
W.P.(C) No. 1112/2025
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