जिसे माफी देकर ‘अप्रूवर’ (गवाह) बनाया गया है, उसे मुकदमे के अंत तक हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है।
- Advocate Sandeep Pandey
- Mar 25
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(एडवोकेट संदीप पांडेय के दृष्टिकोण से)
हाल ही में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 343 के तहत जिसे माफी देकर ‘अप्रूवर’ (गवाह) बनाया गया है, उसे मुकदमे के अंत तक हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है।
न्यायालय ने यह कहा कि धारा 343 BNSS (जो पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 306 के समान है) का उद्देश्य अपराध के खुलासे में सहयोग प्राप्त करना है, न कि ऐसे व्यक्ति को अनावश्यक रूप से कारावास में रखना। यदि अभियोजन की आवश्यकता पूरी हो चुकी है और व्यक्ति सहयोग कर रहा है, तो उसे निरंतर हिरासत में रखना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
कानूनी विश्लेषण:
अप्रूवर को माफी देना एक सशर्त राहत है, जिसमें वह आरोपी से गवाह बन जाता है। परंतु इस स्थिति में उसका दर्जा बदल जाता है—वह अब अभियुक्त नहीं बल्कि साक्ष्य का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। इसलिए, केवल इस आधार पर कि ट्रायल जारी है, उसकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं माना जा सकता।
महत्व:
यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) की रक्षा को मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना है।
निष्कर्ष:
इस फैसले से स्पष्ट होता है कि न्यायालय प्रक्रिया के साथ-साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता के संतुलन को भी महत्व देता है। यह निर्णय भविष्य के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा।
— एडवोकेट संदीप पांडेय
(अधिक जानकारी हेतु: www.advpandey.com)



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