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बाद में जाली पाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति खरीदने पर खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं होता।


Advocate Sandeep Pandey:

Suprim court of India ने यह टिप्पणी की है कि यदि कोई संपत्ति ऐसे वसीयतनामा (Will) के आधार पर खरीदी गई हो, जो बाद में जाली (forged) पाया जाए, तो मात्र इस कारण से खरीदार को विक्रेता द्वारा की गई धोखाधड़ीपूर्ण बिक्री (fraudulent sale deed) के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

 और की पीठ ने खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। खरीदार पर आरोप था कि उसने विक्रेता द्वारा की गई धोखाधड़ीपूर्ण संपत्ति हस्तांतरण में सहयोग किया। न्यायालय ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित जाली वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह उस समय विदेश में था, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में खरीदार को आरोपी नहीं, बल्कि पीड़ित (aggrieved person) माना जाएगा, क्योंकि ऐसी परिस्थिति में संपत्ति पर उसका अधिकार विवादित हो जाता है, क्योंकि उसने वह संपत्ति ऐसे विक्रेता से खरीदी थी जिसने कथित जाली वसीयत के आधार पर बिक्री की थी।

यह विवाद में एक पुराने पारिवारिक संपत्ति विवाद से उत्पन्न हुआ। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके पिता द्वारा 1988 में मृत्यु से पहले बनाई गई वसीयत जाली थी। इसी कथित जाली वसीयत के आधार पर उसके भाई ने 1998 में कई खरीदारों को, जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल था, संपत्ति बेच दी।

इसके बाद IPC के तहत जालसाजी (forgery), धोखाधड़ी (cheating) और आपराधिक साजिश (conspiracy) के आरोपों में मामला दर्ज किया गया। अपीलकर्ता (खरीदार) ने अदालत में याचिका दायर कर कहा कि उसका वसीयत की जालसाजी से कोई संबंध नहीं है और वह एक bona fide (सद्भावना से) खरीदार है।

अपील स्वीकार करते हुए, ने कहा कि केवल इस आधार पर कि बाद में कोई संपत्ति लेन-देन जाली दस्तावेज़ पर आधारित पाया गया, खरीदार को स्वतः आपराधिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय ने पाया कि:

  • खरीदार को जालसाजी या साजिश से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है

  • उसने उचित जांच (due verification) के बाद संपत्ति खरीदी

  • वसीयत के कथित जालसाजी के समय वह नाबालिग था

इन परिस्थितियों में उसके खिलाफ कोई आपराधिक मंशा (criminal intent) नहीं मानी जा सकती।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि खरीदार ने शिकायतकर्ता को धोखा देकर संपत्ति हासिल नहीं की, इसलिए (जो अब की धारा 318(4) के समकक्ष है) के तहत अपराध नहीं बनता।

साथ ही, न्यायालय ने के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि जब खरीदार और शिकायतकर्ता के बीच कोई प्रत्यक्ष अनुबंध (privity of contract) नहीं है, तो केवल विक्रेता के दोषपूर्ण स्वामित्व (defective title) के कारण खरीदार पर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

अंत में, न्यायालय ने कहा कि:

  • खरीदार और शिकायतकर्ता के बीच कोई अनुबंध संबंध नहीं था

  • FIR या आदेश में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि खरीदार जालसाजी या साजिश में शामिल था

इस आधार पर अपील स्वीकार कर ली गई और खरीदार के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द (quash) कर दिया गया।

मामले का शीर्षक:


S. Anand बनाम राज्य तमिलनाडु

 
 
 

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